Corona : संक्रमण से पहले बचाएं फेफड़े, व्यायाम है कारगर

जी हां, अब तक देश के विभिन्न चिकित्सालयों में लाखों कोरोना संक्रमितों की जांच के बाद पाया गया कि इस नए स्ट्रैन से अधिकांश मौते फेफडों के संक्रमित होने से हो रहे है। खास यह है कि समय पर इलाज न होने पर ये वायरस फेफड़े ही नहीं, शरीर के बाकी अंगों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। ये सिस्टम को कमजोर करने के साथ-साथ दूसरे बॉडी पाट्र्स में गंभीर सूजन पैदा कर रहा है। अगर किसी व्यक्ति को डायबिटीज, हाइपरटेंशन या मोटापे की समस्या है तो शरीर पर असर और ज्यादा होता है। जिसकी वजह से कई लोगों में खून के थक्के बनने लगते हैं। जहां खून के थक्के ना सिर्फ फेफड़ों में बल्कि पैर की नसों और शरीर के अन्य हिस्सों को प्रभावित कर रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर छोटे बच्चों के फेफड़े में देखा जा रहा है

-सुरेश गांधी

कोरोना का नए स्ट्रैन में वायरस फेफड़ों को तेजी से संक्रमित कर रहे है। लेकिन सही समय पर इलाज से संक्रमण कम भी हो रहा है। 60 से 70 फीसद तक संक्रमित फेफड़ों वाले रोगी ठीक भी हो रहे है। लंग्स यानी फेफड़े हमारे शरीर का अभिन्न अंग हैं। फेफड़ा शरीर का सबसे अहम् अंग है। इसके बगैर हम दो-तीन मिनट से ज्यादा नहीं जी सकते, क्योंकि इससे शुद्ध ऑक्सीजन हमारे शरीर को पहुंचाता है और कार्बनडाई-ऑक्साइड को हमारे शरीर से बाहर निकालता है। कोरोना वायरस का असर सीधे हमारे लंग्स पर हो रहा है जिससे हमारे लंग्स कमजोर हो रहे हैं। जो बाहर से शरीर फिट तो दिखता है, लेकिन भीतर से वायरस फेफड़ों को खोखला कर देता है। बता दें, फेफड़ों पर ज्यादातर तीन तरह के संक्रमण होते हैं। एक बैक्टीरियल दूसरा वायरल और तीसरा पैरासिटिक। फेफड़ों में इंफेक्शन होने पर फेफड़ों में पानी भर जाता है। फेफड़े जब संक्रमित हो जाते हैं तो सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। और कभी कभी समय पर इलाज ना होने से जानलेवा हो जता है। लेकिन जो लोग रोजाना 30 से 60 मिनट तक ऐसे शारीरिक व्यायाम करे जिसमें उन्हें हांफना पड़े तो वह कारगर है। इससे फेफड़ों की कार्यप्रणाली बेहतर होती है, वे ज्यादा ऑक्सीजन ग्रहण करके शरीर को पहुंचाते हैं। इन व्यायामों में दौड़ना, साइकिल चलाना, तैराकी, अनलोम विलोम आदि प्रमुख हैं। गहरी सास लेने की प्रैक्टिस करें जिससे फेफड़े ज्यादा खुलते हैं, उनकी कार्य क्षमता बेहतर होती है। इससे भी शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है।

कोरोना से ज्यादा खतरनाक लापरवाही साबित हो रही है। ज्यादातर मौत में पाया गया है कि कहीं न कहीं मरीज या स्वजन द्वारा लापरवाही बरती गई है। कई मौत के कारणों की भी पड़ताल की गई। इसमें ज्यादातर मामलों में लापरवाही ही निकल कर सामने आई। अगर मरीज समय पर जांच कराकर किसी चिकित्सक की निगरानी में इलाज शुरू कर चुके रहते तो मौत की नौबत न आती। शुरुआती दौर में बरती जाने वाली यह लापरवाही काफी भारी पड़ रही है। जांच व इलाज में विलंब होने के कारण कोरोना फेफड़े को संक्रमित कर देता है। जब परेशानी अधिक बढ़ जाती है तो मरीज चिकित्सक के पास जाते हैं अथवा हॉस्पिटल में एडमिट होने जाते हैं। तब तक काफी लेट हो जाता है। फेफड़े का संक्रमण काफी हो जाने पर मरीज को बचाया जा सकता है। विलंब से हॉस्पिटल पहुंचने के कारण मरीज की मौत हो जा रही है। इसीलिए कोरोना के लक्षण को नजरअंदाज नहीं करें।

ऐसे में अगर तीन लक्षण जैसे आपको को सांस लेते समय अपने सीने में हल्का या तीखा दर्द महसूस हो रहा हो, सूखी खांसी है और खांसते समय सीने में दर्द महसूस होता हो, सीने के निचले हिस्से में दर्द या फेफेड़ों में सूजन महसूस हो रही हो तो सचेत हो जाएं क्योंकि इससे साफ है कि आपके फेफडे संक्रमित हो चुके है। खतरे की बात यह भी है कि अधिकतर मामलों में लक्षण सामने आने तक 20 से 25 फीसदी तक फेफड़े संक्रमित हो चुके होते हैं। दरअसल, कोरोना वायरस का नया रूप सीधे फेफड़ों को संक्रमित करने लगा है। इसकी वजह से सांस लेने में दिक्कत हो रही है। अगर मरीज की उम्र ज्यादा है और उसे हृदय रोग, कैंसर या डायबिटीज है तो यह लक्षण गंभीर अवस्था में मिल रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि वायरस का यह नया रूप हमारे शरीर के श्वसन मार्ग में तेजी से फैलता है। 80 फीसदी में यह लक्षण हल्के या मध्यम श्रेणी के हैं। सामान्य संक्रमण निमोनिया और फेफड़ों के गहन संक्रमण बदल जाता है जिससे फेफड़े में सूजन आ जाती है। यह संकेत है कि वे (फेफड़े) कोरोना से लड़ रहे हैं। एक हिस्से में हुआ संक्रमण धीरे-धीरे और मरीज अगर कमजोर हुआ तो तेजी से समस्त फेफड़ों को संक्रमित कर सकता है। परिणाम यह होता है कि संक्रमण से मरीज के निमोनिया, सांस लेने में बहुत ज्यादा दिक्कत, फेफड़ों का कॉलेप्स कर जाना और कुछ मामलों में मौत तक हो सकती है।

निमोनिया के दौरान फेफड़ों में पानी भरने लगता है उससे आई सूजन सांस लेने में दिक्कत और तेज खांसी की वजह बनती है, ऑक्सीजन लेवल घटने लगता है। ऐसे मरीजों को ऑक्सीजन न मिले तो उनकी मौत हो सकती है। एक राहत की बात यह है कि इस निमोनिया से अधिकतर मरीज ठीक हो रहे हैं। उनके फेफड़ों पर लंबे समय के लिए नुकसान भी नहीं हो रहा है। हालांकि कुछ मामलों में सांस लेने में दिक्कत लंबे समय तक बनी रह सकती है। फेफड़ों की सेहत सुधारने के लिए केले, सेब, टमाटर, अंगूर आदि का सेवन करें, जिनमें प्राकृतिक एंटी ऑक्सिडेंट होते हैं, यह फेफड़े की सूजन को कम करने में मदद करते हैं। लेकिन अगर आपके फेफड़ों में इंफेक्शन है और आप इससे उबरने की कोशिश कर रहे हैं तो शराब, सिगरेट, बीड़ी और तंबाकू आदि को पूरी तरह छोड़ना होगा। इसके अलावा आपको भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से भी बचना चाहिए। कोशिश करें कि प्रदूषित इलाके में ना रहें, अगर बाहर निकलें तो नाक और मुंह पर कपड़ा बांध कर निकलें। इसके अलावा रोगियों से दूरी बनाकर रखें। क्योंकि जब किसी को फेफड़ों का इंफेक्शन होता है तो उसे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस दौरान घर का बना खाना ही खाएं, बाहर का खाना बिल्कुल ना खाएं। इसके अलावा घर के खाने में हल्दी, सोंठ, अदरख, काली मिर्च और लहसुन का इस्तेमाल करें। जिनको सीने में दर्द और खांसी, बलगम की शिकायत है उनको चिकित्सक सीटी स्कैन और एक्स-रे लिख रहे हैं। जब वह जांच कराते हैं तो उनकी रिपोर्ट में फेफड़ों में कफ जमा हुआ मिलता है। ऐसे मरीजों की कोरोना रिपोर्ट भले ही पास पॉजिटिव नहीं होती, लेकिन उनकी हालत किसी गंभीर मरीज से कम नहीं होती। ऐसे में यह उनके लिए बड़ी परेशानी का सबब बन जाता है।

यह स्ट्रेन सिर्फ वृद्ध और कमजोर ही नही बल्कि युवा को भी कोरोना अपना शिकार बना रहा है, लेकिन अभी भी लोग इस जानलेवा रोग को छिपाने से बाज नहीं आते। कोरोना का कोई लक्षण दिखे तो फौरन एंटीजेन और आरटीपीसीआर जांच जरूर कराएं। एक कठिनाई यह भी है कि कई बार कोरोना के जांच में निगेटिव रिपोर्ट आती है। ऐसी स्थिति में निश्चित नही होना चाहिए बल्कि किसी चिकित्सक से दिखाकर उनसे सलाह लेना चाहिए। अगर कोई भी लक्षण हो तो तुरंत एकांतवास कर इसकी दवा चिकित्सक से संपर्क कर शुरू की जानी चाहिए। प्रारंभिक स्थिति में लापरवाही का दुष्परिणाम यही होता है कि कोरोना फेफड़े में संक्रमण फैलाने लगती है और फिर स्थिति जानलेवा हो जाती है। कुछ ऐसे भी मामले सामने आएं है जिनमें फेफड़ों में 80 प्रतिशत संक्रमण होने के बावजूद धैर्य और आत्मविश्वास के साथ इस महामारी को मात दे दी है। डाक्टरों का कहना है वायरस के इस असर को ’हैप्पी हाइपोक्सिया’ कहा जाता है, यानी उनके शरीर में कोई तकलीफ नहीं होती, लेकिन आक्सीजन की कमी शुरू हो जाती है। आक्सीजन का सैचुरेशन 95 रहता है। आक्सीजन की कमी जांचने के लिए छह मिनट पैदल चलाने के पहले और बाद में आक्सीमीटर से आक्सीजन का स्तर देखना चाहिए। पैदल चलने के बाद पांच पाइंट से ज्यादा कमी नजर आ रही है तो यह न्यूमोनिया का संकेत है। इसके बाद डाक्टर की सलाह से चेस्ट स्कैन कराना चाहिए।

जिन लोगों को पहले से दिल संबंधी कोई बीमारी हो या जिनका मेटाबोलिक सिस्टम खराब हो, उन लोगों में कोविड -19 होने का खतरा ज्यादा रहता है। ऐसे मरीजों के दिल की मांसपेशियों में सूजन बढ़ा देता है। मरीजों में मानसिक दुविधा, भ्रम, सिरदर्द, चक्कर आना और धुंधला दिखाई देने जैसे लक्षण भी इसके संकेत है। कोरोना संक्रमण पहली लहर में 15 साल से कम उम्र के बच्चों का कम नुकसान कर रहा था। दो-तीन साल के बच्चे तो न के बराबर संक्रमित हो रहे थे, लेकिन कोरोना की इस लहर में वायरस के नए स्ट्रेन ने बच्चों के फेफड़ों को भी नहीं बख्शा। अस्पतालों में कोरोना संक्रमण के गंभीर होने के कारण 50 से ज्यादा बच्चे भर्ती हो चुके है। डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बड़ों की तुलना में ज्यादा होती है, लेकिन संक्रमण के बाद यदि समय पर इलाज नहीं मिलता है तो फिर वायरस शरीर पर हावी हो जाता है। दूसरी लहर में यह भी देखने में आ रहा कि परिवार में पहले बच्चों में कोरोना के लक्षण नजर आ रहे हैं, क्योंकि वे घर के बाहर दूसरे बच्चों के साथ खेलते हैं। संक्रमण का वाहक बनकर परिवार के अन्य सदस्यों में भी कोरोना ले आते हैं। हालांकि इलाज और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ उसे हराने में कामयाब होते हैं। छह माह के एक बच्चे के फेफड़ों में 50 फीसद संक्रमण था, लेकिन उसने कोरोना को हरा दिया। ऐसे में बच्चों में अगर दस्त, उल्टी और बुखार आता है तेा अलर्ट हो जाएं। कई बार इन लक्षणों की वजह से कोरोना संक्रमण समझ नहीं आता। अभिभावक इन लक्षणों को गंभीरता से लें और सामान्य वायरल समझने के बजाय कोरोना टेस्ट कराएं। सुस्ती और दिमागी बुखार भी कोरोना संक्रमण के लक्षण हैं। शरीर पर हल्के दाने नजर आते हैं। इसके अलावा सिर भी भारी होने लगता है।

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