सजा-ए-इकबाले जुर्म….

सुनवाई प्रारंभ की जाए...!

-रमेश कुमार

आज आंखों में लाल डोरे लिए हुए जज कार्तिकेय अपने चैम्बर में पहुंचे. आते ही अपने पेशकर से पूंछा “आज किन किन केसों में डेट लगी हुई है, पत्रावली निकाल कर रख दिया या नहीं.”
“जी सर आज पांच केसो में डेट लगी हुई है. पहला वन विभाग का है. सभी फाइलें मेज पर क्रम से आपके सम्मुख मेज पर रखी हुई हैं.”-पेशकार गगन ने कहा.
“क्या पहले केश में वादी और प्रतिवादी दोनों आ चुके हैं? यदि दोनों आ चुके हों तो केश की सुनवाई प्रारंभ की जाए…!” – जज ने कहा.
“सर वादी घुम्मन हाजिर हैं, परंतु प्रतिवादी शिवम वन दरोगा अभी उपस्थित नहीं हुए हैं…!”-गगन ने कहा.
“कहीं यह वही केश तो नहीं है, जिसमें प्रतिवादी दरोगा पिछली चार तारीखों से बराबर गैर हाजिर है.”-जज ने कहा.
दोनों वादी प्रतिवादी वकील सुरेश और मुनेश एक दूसरे को कातर नजरों से देखने लगे.
मुनेश ने कहा “योर आनर मेरा मुवक्किल बराबर आज पांचवी तारीख पर हाजिर है, जबकि प्रतिवादी शिवम वन दरोगा आज पांचवी तारीख पर भी उपस्थित नहीं हुए हैं और न ही उनके द्वारा अभी तक केश प्रापर्टी ही प्रस्तुत किया गया है. इससे यह स्पष्ट है कि मेरे मुवक्किल पर झूठा बेबुनियाद केस दर्ज कर उसे फंसाया गया है. सच तो यह है योर आनर कि मेरा मुवक्किल घुम्मन जंगल किनारे अपना खेत देखने गया था, तभी लगभग सायं 4 बजे जंगल के अंदर थोड़ी दूरी पर तेज-तेज कराहने की आवाज आई. उत्सुकता वश घुम्मन जंगल की सीमा पर पहुँच गया. वह इस बात की जानकारी नजदीकी चौकी प्रभारी को देने जाने ही वाला था कि कोई बड़ा जानवर घायल है, उसी समय शिवम वन दरोगा अपने साथियों के साथ आ पहुंचे और घुम्मन को पकड़ लिया और अपने साथ यह कहते हुए लिए चले गए कि काफी दिनों से यहाँ फंदा लग रहा था. कोई पकड़ में नहीं आ रहा था, अब यही बचाएगा हमारी नौकरी. योर आनर चूंकि सायं का समय था, जंगल का किनारा था, स्टाफ के अतिरिक्त वहाँ कोई उपस्थित नहीं था. इसलिए कोई गवाह प्रस्तुत नहीं किया जा सका. परन्तु आज प्रतिवादी शिवम वन दरोगा ने लगातार पांचवी तारीख पर अनुपस्थित रहकर यह साबित कर दिया कि उन्हें अपने द्वारा की गई गलती का पश्चाताप हो रहा है. उनके पास इस केस में सिद्ध करने के लिए कुछ भी शेष नहीं है. योर आनर केश आइने की तरह साफ है. मेरा मुवक्किल निर्दोष है. अत: मेरे मुवक्किल को केस से बाइज्जत बरी करते हुए प्रकरण में मेरे मुवक्किल को फर्जी तरीके से फंसाने के जुर्म प्रतिवादी को कठोर से कठोर सजा सुनाई जाए, जिससे आम जनमानस में न्याय का एक आदर्श उदाहरण स्थापित हो सके.”
सुरेश मन ही मन भुन-भुनाते हुए “एक तो यह जज आज वैसे ही अपनी त्योरियां चढ़ा के आया है. ऊपर से यह मुनेश कालिया आज तो यह मरवा के ही छोड़ेगा. पता नहीं क्यों जज साहब की मैडम को भी आज ही झगड़ा करने को मिला था?”
जज गुस्से में लाल पीला होता हुए “सबने कोर्ट को मजाक समझ रखा है, आज बताता हूँ, डिस्पलिन होता क्या है? वादी वन अधिवक्ता उपस्थित हैं या अपने मुवक्किल की तरह वह भी फरार हैं.”
प्रतिवादी वकील सुरेश ने खड़े होकर जैसे ही अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाही, वैसे ही एक कर्मचारी कक्ष में आया उसने कहा “सर बाहर वकील और लोगों में विवाद हो गया है. इसी बीच हार्ट अटैक के कारण एडवोकेट धनंजय सिंह की मृत्यु हो गई है.”
समाचार सुनते ही जज साहब ने अनीक्षित मन से अगले दिन तक के लिए कोर्ट स्थगित कर दिया. जैसे ही यह समाचार मिला प्रतिवादी वकील मुनेश वादी वकील सुरेश की तरफ कातर नजरों से देखते हुए भुनभुनाया “बच्चा आज तो तुम्हारे मुवक्किल को इस धनंजय ने बचा लिया. इस ससुरे को भी आज ही मरना था. लेकिन कब तक बचेगा? तुम्हारा मुवक्किल देखते हैं.”
सुरेश ने अपना दाहिना हांथ अपने सीने पर रखते हुए ऊपर की तरफ देखा और कहा “हे ईश्वर आज तूने एक गलत फैसला होने से बचा लिया.”
ठीक पंद्रह दिन के बाद आज फिर डेट लगी थी. वादी शिवम दरोगा आज सुनवाई प्रारंभ होने से 4 घंटे पहले ही न्यायालय पहुँच गया था और विचित्र बात यह थी कि अक्सर विलंब से आने वाला वादी एडवोकेट सुरेश भी पूरी संजीदगी के साथ तीन घंटे पहले ही पहुँच गया था. दोनों ने एक दूसरे को अभिवादन अत्यंत विनम्र भाव से किया, फिर सुरेश ने शिवम के साथ विचार विमर्श करते हुए समझाना प्रारंभ किया “देखो शिवम तुम पिछली पांच तारीखों से कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए….! जज साहब बहुत नाराज हैं शिवम..! तुम बहुत ही विनम्र होकर अपनी बात रखना. तुम्हारी बराबर अनुपस्थिति के कारण केश उल्टा पड़ चुका है, हमारी जरा सी असावधानी हमें केस से दूर लिए चली जाएगी.”
अब तक ध्यान से पूरी बात सुन रहा शिवम एक दम से तमतमा उठा. “तुम काहे के वकील हो? जो अपना पक्ष भी ठीक से नहीं रख सकते…! तुम्हे मालूम नहीं हमने सारे एप्लीकेशन आपको भेजे हैं. आपने कोर्ट में क्यों सबमिट नहीं किए? मेरी गलती है इसमें. बिलकुल चिल्लाने के आवाज में शिवम बोला.”
सुरेश अब पूरी तरह विनम्र होकर हांथ जोड़ देने के भाव में आ गया बोला “भैया शांत..! मैं मानता हूँ कि आपकी कोई गलती नही है, परन्तु जज साहब और मुनेश क्यों इस बात को मानने लग जाएंगे? पहले आपके दो एपलीकेशन मुंशी जी ने नहीं दिए समय से, वह छुट्टी पर चले गए. आपके एपलीकेशन उन्ही के पास थे. तीसरी डेट में मैं खुद छुट्टी पर था. चौथी डेट में कन्फ्यूजन हो गया मुझे लगा था पिछले दो दिनों से जारी हड़ताल चैथी डेट वाले दिन भी जारी रहेगी और कोर्ट नहीं खुलेगा, जबकि उसी दिन सुबह अचानक पता चला कि आज हड़ताल समाप्त हो गई है. पिछली अंतिम तिथि में तुमसे खुद दुर्घटना हो गई और तुम अस्पताल में व्यस्त थे.”
“तो इस सबमें मेरी गलती कहाँ पर है.” शिवम ने कहा.
सुरेश बड़ी मुश्किल से समझा पाया था शिवम को. सारे लोग कोर्ट में पहुँच चुके थे. सुनवाई प्रारंभ हुई जज साहब बैठ चुके थे. प्रतिवादी वकील मुनेश खड़ा हुआ और बोलना प्रारंभ किया योर आनर जैसा कि पिछली तिथि में ही स्पष्ट किया जा चुका है कि मेरा मुवक्किल पूरी तरह से निर्दोष है. उसे साजिशन फंसाया गया है. इस केस में अब कहने और स्पष्ट करने के लिए कुछ शेष नहीं है. अतः आपसे गुजारिश है कि औपचारिकता पूरी करते हुए फैसला सुनाकर न्याय दिलाने की कृपा करें. ”
तभी सुरेश खड़ा हुआ “योर आनर इससे पहले कि इस केस में कोई अंतिम निर्णय लिया जाए मेरी दरख्वास्त है कि मेरे मुवक्किल को एक बार अपनी बात रखने का सुअसर प्रदान किया जाए.”
“अच्छा तो जनाब पिछली 5 डेटों के बाद आज आ ही गए. अहो भाग्य हमारे. अरे कहाँ है भाई तुम्हारा मुवक्किल? बुलाओ! बुलाओ! जरा हम भी तो दर्शन कर लें.”-जज साहब ने कहा.
शिवम के अपनी जगह से उठने से पहले ही अपने वकील सुरेश की तरफ नजर बरबस चली गई. कर्कश निगाहों को देखते ही मन ही मन बुदबुदाते हुए “माफ करना भाई! मेरी फजीहत मत करवा देना!” दोनों हांथ सुरेश ने शिवम की ओर जोड़ दिए.
शिवम कटघरे में पहुँच गया. सवाल सीधा जज साहब ने किया “क्यों भाई तुम्हे कोर्ट का डर नहीं लगता? यहाँ भी अनुशासनहीनता! तुम लोग ड्यूटी कैसे करते होगे? कोर्ट को मजाक समझ रखा है. ले जाओ भाई इनको छरू घंटे के लिए अंदर डाल दो.”
शिवम बिलकुल रुंआसी आवाज में दोनों हांथ जोड़ कर लगभग घुटनों बल बैठते हुए “सर प्लीज मुझे सब स्पष्ट करने का अवसर दे दीजिए. आप जो सजा देंगे सब मंजूर है हमें. प्लीज सर प्लीज!”
बार बार गिड़गड़ाने मिन्नते करने के कारण आखिर कार जज साहब को दया आ ही गई. जज साहब ने कहा “ठीक है बताओ क्या बात है?”
शिवम ने तिथिवार विवरण देना प्रारंभ किया. जैसे ही शिवम ने पहली तिथि का नाम लिया सुरेश का दिल ऐसे धड़कने लगा जैसे चट्टान टूट रही हो. उसने अपनी दोनों आंखें बंद कर ली थी. बिलकुल प्रार्थना की मुद्रा में आ गया था.
तभी शिवम ने एक के बाद एक प्रारंभिक तीनों तिथियों का एक साथ जिक्र करते हुए आगे बात पूरी की “सर मेरी माँ का स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया था. उसकी दौड़ धूप उलझनों के कारण मैं सूचना नहीं भेज पाया दवा के सारे पर्चे व बिल घर पर ही रखे हुए हैं. यदि आपका आदेश होगा तो अगली जो भी तिथि होगी चाहे कल की ही क्यों न हो? हम सब प्रस्तुत कर देंगे.”
सुरेश ने जैसे ही यह बात सुनी उसने अंदर ही अंदर राहत महसूस की ऊपर की तरफ देखते हुए अपने दोनों हांथ जोड़ दिये और बुदबुदाया “हे ईश्वर आपने आज मेरा बार लाइसेंस कैंसिल होने से बचा लिया.”
शिवम ने चौथी डेट के बारे में बताया “सर आप तो जानते ही हैं कि उससे पहले लगातार दो दिन तक हड़ताल रही थी और अगले दिन भी पूरी हड़ताल की संभावना थी. वह तो अचानक से कोर्ट उस दिन खुल गया था और सर अंतिम तारीख पर आते समय अचानक से मेरी गाड़ी के सामने गाड़ी तेजी से आ गई, जिसके कारण एक्सीडेंट हो गया था. सर मेरी कोई भी गलती न होने के बावजूद सिर्फ मानवता के कारण मैंने ही उस आदमी को हास्पिटल में एडमिट कराया था. मैंने उस दिन अपना खून भी उसे दिया था. वह ऐसी उस दिन की चर्चित नवीन घटना है जिसका अभी कोर्ट से ही पुष्टि की जा सकती है. सर अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि मैंने कोई जानबूझकर गलती नही की है.”
जज साहब के हावभाव से स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वह शिवम के पूर्ण कुशलता से रखी गई बात से प्रभावित हो गए थे. इससे पहले की जज साहब कोई निर्णय लेकर कार्यवाही को आगे बढ़ाते प्रतिवादी वकील मुनेश खड़ा हो गया और बोला “योर आनर वादी मुवक्किल झूठ पर झूठ बोले जा रहा है, नई-नई कहानियाँ गढ़ कर कोर्ट को गुमराह कर रहा है और आप उसे एलाउ कर रहे हैं, जबकि मामले में पहले ही स्पष्ट हो चुका है कि पूरा केस ही फर्जी है, मेरा मुवक्किल निरपराध है. उसे बाइज्जत बरी किया जाए.”
जज साहब ने मुनेश की ओर मुखातिब होते हुए कहा कि वकील साहब आपके पास कोई सबूत है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि वादी शिवम दरोगा ने जो भी कोर्ट के सामने बातें बताई हैं वह झूठ हैं?”
“योर आनर वैसे तो मेरे पास इसका कोई सुबूत नहीं है, परन्तु वादी शिवम ने अपने द्वारा बताई गई चिनाब झेलम जैसी कहानी का अभी तक कोई पुख्ता सुबूत प्रस्तुत नहीं किया है, जिससे यह स्पष्ट है कि इनके द्वारा जो भी बताया गया है, वह केवल एक कोरी कहानी है, और कुछ नहीं है. दैट्स आल योर आनर”
वादी वकील सुरेश ने कहा “योर आनर मेरे मुवक्किल को अपनी बात साबित करने के लिए कुछ वक्त दिया जाए! इससे पहले मेरा निवेदन है कि अभियुक्त घुम्मन से मुझे कुछ पूंछताछ करने की इजाजत प्रदान की जाए.”
“मुवक्किल शिवम को अगली तिथि में सारे साक्ष्य कोर्ट में रखने की एवं अभियुक्त घुम्मन से पूंछताछ करने की अनुमति प्रदान की जाती है.”-जज साहब ने कहा.
घुम्मन कटघरे में आ चुका था. कोर्ट की सत्य शपथ रस्म एक बार फिर पूरी हो चुकी थी. वादी वकील सुरेश ने जज साहब का शुक्रिया व्यक्त करते हुए घुम्मन से पूंछना प्रारंभ किया “तो आपका नाम घुम्मन है और जैसा कि केस में लिखा हुआ है और आपके काबिल वकील ने भी यह स्वीकार किया है कि आप मौकाए वारदात मौजूद थे. क्या आप इसे स्वीकार करते हैं? जिस समय घटना घटी उस समय, समय लगभग कितना रहा होगा?”
जज साहब की ओर मुखातिब होते हुए घुम्मन ने कहा “जज साहब मैं ही घुम्मन हूॅ, यह रहा मेरा आधारा कार्ड और वोटर आईडी, और जैसा वकील साहब ने कहा वह सरासर झूठ है कि मैं मौकाए वारदात मौजूद था. जज साहब मैं घटना स्थल से लगभग 300 मीटर दूर अपने खेत में था. उस समय लगभग सायं के 4-5 के बीच का समय रहा होगा.”
“जब आप घटना स्थल पर थे ही नहीं. घटना स्थल से 300 मीटर दूर अपने खेत में थे तो आपको कैसे पता चला कि जंगल में कोई कराह रहा है. आप जहां पर खड़े थे वहां से कराहने की आवाज किधर से आई मालूम पड़ी थी. जिस समय आपको कराहने की आवाज आई, उसके कितनी देर बाद आप उस आवाज की तरफ गए, और उस समय आपके साथ कौन-2 था? जंगल के अंदर जाते समय क्या आपको डर नहीं लगा था कि कोई हिंसक पशु भी हो सकता है, जिससे आपको जान का खतरा उत्पन्न हो सकता है.”-सुरेश ने कहा.
“वकील साहब जहां मैं खड़ा था, वहां कराहने की आवाज इतनी तेज आई थी, कि मुझे 200-400 मीटर दूर भी यदि कोई मनुष्य होता तो उसे भी वह आवाज सुनाई दे जाती. मैं जहां पर खड़ा था वहां मुझे उत्तर पश्चिम से आवाज सुनाई पड़ी थी. मुझे जैसे ही आवाज सुनाई पड़ी. मैं अपने आपको रोक नहीं पाया और उस दिशा में आगे बढ़ गया, उस समय मेरे साथ और कोई नहीं था. मैं अकेला ही था, चूंकि हम लोगों का ऐसी घटनाओं से नित्यप्रतिदिन सामना होता ही रहता है, इसलिए मैं भलीभाॅति आश्वस्त था कि मुझे कहाॅ तक और कैसे जाना है?”-घुम्मन ने कहा.
“आप सरासर झूंठ बोल रहे हैं. जैसा आप कह रहे हैं, उसके अनुसार पहला झूठ तो यह है कि आवाज लगभग 01 किमी0 की परिधि में आस-पास गई, परन्तु वहाॅ आपके सिवाए और कोई नहीं था. ऐसा कैसे हो सकता है कि वहां आस-पास में सारे खेत ही हैं, इसके बावजूद आपके अलावा आस-पास में दूसरा कोई किसान था ही नहीं. जबकि वास्तव में वह ऐसा समय होता है, जिस समय अक्सर लोग अपने खेतों की ओर जाते हैं, विशेष कर जंगल के किनारे वाले क्षेत्रों में . दूसरा झूठ यह है कि जहां पर घटना स्थल है, उसके दांई तरफ तो बड़ा तालाब है, जिसके कारण आवाज टकराकर दक्षिण पश्चिम की तरफ से आनी चाहिए थी.” -सुरेश ने कहा.
“आब्जेक्शन योर आनर वादी मेरे मुवक्किल को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं.”-मुनेश ने कहा.
“आब्जेक्शन ओवर रुल्ड प्लीज कीप कांटिन्यू.”-जज साहब ने कहा.
“चूंकि उस समय सायं का समय था. इसलिए अधिकांश लोग अपने घरों को वापस लौट चुके थे, वैसे भी चूंकि वन्य जीवों का बराबर सीमा पर आने की संभावनाएं बनी रहती हैं, इसलिए भी लोग वहां कम ही ठहरते हैं. चूंकि मुझे अपने खेत में फसल बोनी थी, तो मैं केवल यह देखने गया था कि सींचा गया खेत जोतने वाला हुआ या नहीं. आवाज के संबंध में साहब मैं कन्फ्यूज हो गया था. वकील साहब सही कह रहे हैं, जहां पर मैं खड़ा था वास्तव में उसके दांई तरफ तालाब है. आवाज वास्तव में दक्षिण पश्चिम की ही तरफ से आई थी.”-घुम्मन ने कहा.
तीन बार सुरेश ने फिर पूंछा “आवाज किधर से आई थी.” हरबार अब घुम्मन का एक ही उत्तर था कि “आवाज दक्षिण पश्चिम की ही तरफ से आई थी.”
सुरेश ने जज साहब से कहा “प्वाइंट टू बी नोटेड सर.”
फाइल से फोटा का एक बड़ा लिफाफा निकालकर घुम्मन को देते हुए “जरा इन्हें ध्यान से देखिए इसमें सारे फोटो हैं क्या यह फोटो उसी घटना वाली जगह के ही हैं? इन फोटुओं को देखकर मेरी एक बात समझ में नही आ रही है कि चीतल का गला छूरी, चाकू से भी नहीं काटा गया लगता है, क्योंकि उसमें वक्त ज्यादा लगता, न हंसिया से काटा गया है, उससे बराबर नहीं कटता. समझ में नहीं आ रहा कि आखिर गला काटा कैसे गया है?”-सुरेश ने कहा.
बहुत ही बारीकी से सभी फोटुओं को देखते हुए घुम्मन ने कहा “”हाॅ वकील साहब यह फोटो उसी जगह के हैं, यह देखो दरोगा साहब भी तो हैं इसमें. और क्या साहब चाकू, छूरी हंसिया लगा रखा है? कहना क्या चाहते हैं आप उसका गला हमने तलवार से काट दिया था? अरे साहब उसे किसी बड़े जानवर ने मारा था. इन फोटुओं में कहीं हथियार से कटने जैसा लग रहा है”-घुम्मन ने कहा.
“प्वाइंट टू बू नोटेड सर.”-सुरेश ने कहा.
मुनेश का चेहरा लाल हो चुका था, उसने घुम्मन को खा जाने वाली नजरों से देखा. मन ही मन बुदबुदाते हुए “मरो तुम्हें तो अब कोई बचा नहीं सकता. कहा था सिर्फ उतना ही बताना जितना बता रहा हूॅ, परंतु बके जा रहे हो, जो मन में आए जा रहा है. मरो मुझे क्या करना है?”
“जज साहब को सारे फोटो के साथ एक अन्य लिफाफा फोटो का देते हुए, जिसमें घटना स्थल के दूसरे एंगल के फोटो थे, जिसमें गला किसी धारदार हथियार से काटा जाना स्पष्ट लग रहा था, दिखाते हुए “सर यही वह फोटो हैं, जिसे स्वयं अभियुक्त ने स्वीकार किया है कि यह सभी फोटो घटना स्थल के ही हैं। इन सभी फोटुओं को ध्यान से देखने पर दो बातें एकदम स्पष्ट हैं कि घटना-स्थल जो फोटो में दिख रहा है, उसके आस-पास झाड़ी लगभग एकदम ठीक है, किसी भी प्रकार से किसी अन्य पशु से द्वंद की स्थिति के आसार बिल्कुल भी नहीं है, दूसरी बाद में दिए गए फोटुओं में गला सफाई से काटा जाना लग रहा है, न कि किसी अन्य हिंसक जानवर द्वारा मारे जाने के. योर आनर जानबूझकर वही फोटो दिए गए थे, जिनमें पूरा सिरा कटने का नहीं है, तीसरी बात तलवार से काटे जाने का जिक्र मैंने नहीं किया था, यह जिक्र स्वयं अभियुक्त द्वारा किया गया है. आखिर तलवार ही क्यों? कोई अन्य हथियार क्यों नही बताया गया अभियुक्त द्वारा, क्योंकि इससे पहले कि वह कोई झूठ गढ़ पाता सच बाहर आ गया ? योर आनर केस और मेरे मुवक्किल के बयान के अनुसार वन्य जीव की हत्या किसी तलवार जैसे हथियार से ही की गई है, यह पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी लिखा हुआ है, यह रही रिपोर्ट. घटना का समय भी वही है जो लगभग अभियुक्त ने स्वीकार किया है. चौथा झूठ यह है कि मैंने तालाब का आधा सच कहा था. जिस समय की घटना है, उस समय मई का अंतिम सप्ताह था. तालाब पूरी तरह से सूखा हुआ था, आवाज परिवर्तित होने का मतलब ही नहीं बनता है, जबकि अभियुक्त द्वारा तालाब की कहानी पर विश्वास करके आवाज की दिशा को बदला जाना स्वीकार किया गया है. मौकाए वारदात के फोटो आपको दिखाए जा चुके हैं, सीजर की गई तलवार अन्य उपकरण भी अवलोकन हेतु मौजूद हैं. पाॅचवी बात इन्होंने यह झूठ बोली है कि वहां पर इनके अलावा और कोई नहीं था, क्योंकि इनके अलावा इनके साथ तीन अन्य साथी भी थे. जिन सभी के पगमार्क का पीओपी कास्ट भी उपलब्ध हैं, क्योंकि यह सत्य है कि अभियुक्त अपने साथियों सहित अपने ही खेत के किनारे से होकर जंगल के अंदर गए थे, ताजे पगमार्क होने के कारण उनका भी पीओपी कास्ट करा लिया गया था, जिसका मिलान सीजर सामग्री के साथ उपलब्ध अभियुक्त के जूतों से किए जा सकते हैं. घटना स्थल के कुछ ही दूरी पर एक और अभियुक्त का जूता मिला है, जिसके निशान भी एक फुटप्रिंट पीओपी कास्ट से मेल खाता है. इसी तरह कई अन्य सुबूत हैं, जिनकी जाॅच कराकर यह साबित किया जा सकता है कि घुम्मन और इसके साथियों द्वारा ही वन्य जीव की हत्या की गई थी. अब घुम्मन अपना जुर्म तुम अपने आप स्वीकार कर थोड़ी दया के पात्र बनोगे या फिर जो शेष कार्यवाही बची है, उसका इंतजार कर पूरी तरह से दोषी साबित जाने के उपरांत दया की पात्रता भी खोओगे. फैसला आप पर निर्भर है।”
घुम्मन को स्थितियों का अंदाजा लग गया था कि बचना नामुमकिन है, वह कोर्ट में ही फूट-फूटकर रोने लगा, उसने पूरी कहानी बयां कर दी अपने साथियों के नाम भी बता दिए.
ठीक उसी समय शिवम ने जज साहब से कहा “साहब उस हास्पिटल का रुम अटेंडेंट अभिलेखों सहित कोर्ट में मेरी विनती पर उपस्थित हो चुका है, जो मेरे द्वारा उस पाॅचवी तिथि में दुर्घटना हो जाने के बाद उस व्यक्ति को भर्ती कराया गया था, तथा उसे रक्तदान किया था. चूंकि अस्पताल यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है इसलिए सहयोग मिल गया है.”
जज साहब ने कहा “दरोगा जी अब इस औपचारिकता की कोई जरुरत ही नहीं है, क्योंकि अभियुक्त द्वारा अपना अपराध स्वीकार किया जा चुका है. तीनों अभियुक्तों को बराबर का दोषी मानते हुए 03-03 वर्ष सश्रम कारावास की सजा और प्रत्येक सदस्य 20000/- रुपया का जुर्माना. अभियुक्त घुम्मन द्वारा चूंकि अपने अपराध को स्वतः ही स्वीकार करते हुए अंत समय में माफी मांगी है, इसलिए इनके द्वारा गिरफ्तारी के समय की 03 माह की सजा को समायोजित करते हुए 09 माह की सजा और कम की जाती है.”

लेखक : वन एवं वन्य जीव प्रेमी
दुधवा टाइगर रिजर्व
लखीमपुर खीरी
मोबाइल नंबर-9721827457
ईमेल-ramesh111.palia@gmail.com

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