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वास्तविकता की माया वास्तविक काया के रक्षण में सहायक होती है : आशुतोष राणा

भीम की प्रतिमा भाग_१

आशुतोष राणा:

पांडवों की विजय के साथ महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ। युधिष्ठिर को हस्तिनापुर के सम्राट धृतराष्ट्र का संदेशा मिल चुका था कि वे अपने सभी महावीर भाइयों के साथ हस्तिनापुर पधारें और विधिवत सम्राट के पद को ग्रहण करें।

संदेश वाहक ने यह भी कहा था कि महाराज धृतराष्ट्र अपने अनुज पुत्र महान बलशाली भीमसेन को अपने हृदय से लगाकर उनका विशेष रूप से अभिनंदन करना चाहते हैं, क्योंकि भीमसेन ने अकेले ही दुर्योधन सहित उनके सभी सौ पुत्रों को यमलोक पहुँचाकर मात्र अपने संकल्प को ही पूरा नहीं किया है अपितु उन्होंने कुरूवंश से पाप और अधर्म का समूल नाश करते हुए धर्म की स्थापना के लिए विशेष उद्यम किया है।

धृतराष्ट्र के स्नेह आमंत्रण को सुनकर युधिष्ठिर ग्लानि और अपराधबोध से मुक्त हुए, उन्हें लग रहा था कि सम्भवतः महाराज धृतराष्ट्र इस बात से क्षुब्ध होंगे कि उनके सभी पुत्र इस युद्ध में पाण्डु पुत्रों के द्वारा समाप्त कर दिए गए हैं।

धृतराष्ट्र के संदेशे को सुनकर भीमसेन प्रसन्नता से अट्टहास करते हुए बोले- कितना अच्छा होता यदि महाराज धृतराष्ट्र मेरे बल, पराक्रम का अभिनंदन युद्ध से पहले कर लेते तो कुरूवंश इस महाविनाश से बच जाता।

किंतु धृतराष्ट्र के संदेश को सुनकर श्रीकृष्ण चिंतित हो गए, क्योंकि वे जानते थे कि प्रतिशोध की भावना क्षुब्ध समुद्र से भी अधिक शक्तिशाली होती है, वे इस सत्य को भी जानते थे कि धृतराष्ट्र नेत्रहीन अवश्य हैं किंतु शक्तिहीन कदापि नहीं हैं। बल्कि उस नेत्रहीन सम्राट की शक्ति उसके हृदय में संचित रोष, प्रतिशोध की भावना के कारण और अधिक बलवती हो गयी होगी। श्रीकृष्ण समझ रहे थे कि यह धृतराष्ट्र का प्रेम नहीं प्रतिशोध है, वो निश्चित ही भीमसेन को अपने हृदय से लगाकर, अपनी भुजाओं की शक्ति से भीम को समाप्त करके अपने प्रतिशोध को पूरा करना चाहता है।

श्रीकृष्ण ने चर्चा के सूत्र को अपने हाथ में लेते हुए संदेश वाहक से कहा- महाराज से निवेदन करना की हम युद्ध में समाप्त सभी योद्धाओं का विधि विधान से अंतिम संस्कार करने के बाद शीघ्र ही उनकी सेवा में उपस्थित होंगे।

संदेश वाहक के जाने के बाद रात्रि के अंधकार में श्रीकृष्ण ने भीम को अपने साथ लिया और एक मूर्तिकार के पास पहुँचे उसे आदेश दिया की वह भीम के आकार की ही एक लौहप्रतिमा का निर्माण करे, जो भीम का प्रतिरूप दिखाई दे।

भीमसेन श्रीकृष्ण के इस विचित्र व्यवहार पर चकित थे उन्होंने कहा- कृष्ण प्रतिमाएँ मृत लोगों की बनती हैं जीवित लोगों की नहीं ! और हंसते हुए बोले- तुम देख रहे कृष्ण कि १०० कुरु पुत्रों का अकेले ही वध करने वाला तुम्हारा भाई ‘संकल्पमूर्ति भीम’ अभी जीवित है।

कृष्ण ने मधुर मुस्कान के साथ कहा- भ्राता भीम, भीमकार्य करने वाले युगपुरुषों की मूर्तियाँ यदि उनके जीवन काल में बन जाएँ तो वे उनकी आयु में वृद्धि का कारण होती हैं। कभी-कभी वास्तविकता की माया वास्तविक काया के रक्षण में सहायक होती है।

 

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