धर्म/अध्यात्म – The Lucknow Times https://thelucknowtimes.com Hindi News, Lifestyle & Entertainment Articles Sat, 16 Aug 2025 03:15:36 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.8.2 CM योगी ने कलाकारों को किया सम्मानित, संस्कृति एप का शुभारंभ https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/149984/ Sat, 16 Aug 2025 03:14:34 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=149984 भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतीक चिन्ह का किया अनावरण, संस्कृति एप का भी किया शुभारंभ, कलाकारों के साथ किया संवाद, सीएम ने अधिकारियों को सभी कलाकारों को रामलला के दर्शन कराने के दिये निर्देश, सभी कलाकारों ने सीएम योगी का जताया आभार, अयोध्या भ्रमण के निर्देश पर कलाकारों की तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजा सभागार

लखनऊ : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को 79 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विधान भवन के समक्ष प्रस्तुति देने वाले उत्तर प्रदेश समेत विभिन्न राज्यों के कलाकारों को सम्मानित किया। इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतीक चिन्ह का अनावरण किया। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग के संस्कृति एप का शुभारंभ किया। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कलाकारों के साथ संवाद भी किया।

मुख्यमंत्री ने इन कलाकारों को सम्मानित किया
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 79 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विधान भवन के समक्ष प्रस्तुति देने वाले उत्तर प्रदेश समेत विभिन्न राज्यों के कलाकारों को सम्मानित किया। सीएम ने मध्य प्रदेश के कलाकार पद्मश्री अर्जुन सिंह ध्रुव, बिहार के कलाकार विशाल कुमार, सिक्किम की कलाकार नीता छेत्री, गुजरात के कलाकार योगेश पतड़िया, छत्तीसगढ़ के कलाकार वेद प्रकाश महेश्वरी, वाराणसी के कलाकार, भरत लाल प्रसन्ना, आकाश पांडेय, रंजीत तिवारी (पाणिनी कन्या महाविद्यालय), सोनभद्र की कलाकार सोना, अयोध्या की संगीता आहूजा, लखीमपुर खीरी की प्रो. ज्याेति पन्त (युवराज दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय), लखनऊ की डॉ.ललिता गणेश भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय, डॉ. प्रेरणा राय और मथुरा के कलाकार संजय शर्मा को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। सीएम ने बैगा कर्मा नृत्य, गोदान नृत्य, उर्केली नृत्य, पंथी नृत्य, शहनाई वादन, डमरु वादन, शंख वादन, गरदबाजा, बधावा नृत्य, जनजातीय नृत्य, कजरी और कथक नृत्य विधा के कलाकारों को सम्मानित किया। इसके अलावा मथुरा के कोरियोग्राफर को भी सम्मानित किया।

कलाकारों को अयोध्या में रामलला के दर्शन कराने के दिये निर्देश
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कार्यक्रम में संस्कृति विभाग के संस्कृति एप का शुभारंभ भी किया। इसके साथ ही भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतीक चिन्ह का अनावरण किया। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विभिन्न कलाकारों से संवाद किया। इस दौरान उन्होंने कलाकारों से कहा कि उन्होंने राजधानी के साथ अयोध्या में रामलला के दर्शन किये। इस पर कलाकारों ने सीएम से अयोध्या में रामलला के दर्शन की इच्छा जाहिर की। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को कलाकारों के दल को अयोध्या में रामलला के दर्शन कराने के निर्देश दिये। साथ ही राजधानी के विभिन्न स्थानों के साथ राजभवन का भ्रमण कराने के निर्देश दिये। यह सुनकर कलाकरों के चेहरे पर खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सभी कलाकारों ने संवाद के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रुमख सचिव संस्कृति मुकेश मेश्राम, संस्कृति विभाग के निदेशक विशाल सिंह आदि मौजूद रहे।

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यहां से यमराज को भी लौटना पड़ा था, बेलपत्र चढ़ाने से पूरी होती है मुराद https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/149588/ Tue, 05 Aug 2025 07:49:41 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=149588 पूर्वांचल के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है मार्कंडेय महादेव मंदिर

सिमरन पाठक

सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा अत्यंत शुभ और शीघ्र फल देने वाली मानी गई है। यही कारण है कि इस पावन महीने में देश के शिवालय में शिवभक्तों की भारी भीड़ दर्शन और पूजन के लिए पहुंचती है। शिव के प्रमुख पावन धाम में से एक है मार्कंडेय महोदव मंदिर, जो कि बाबा विश्वनाथ की नगरी से महज 30 किमी की दूर वाराणसी—गाजीपुर राजमार्ग पर कैथी में स्थित है। गंगा-गोमती के संगम तट पर स्थित मार्कंडेय महादेव मंदिर में सावन के महीने में भक्तों का तांता लगा हुआ है। इस मंदिर का इतिहास अद्भुत है। मार्कंडेय महादेव मंदिर पूर्वांचल के श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। पूर्वांचल के विभिन्न जिलों से लाखों भक्त जलाभिषेक करने के लिए मार्कंडेय महादेव मंदिर में आते हैं। सावन माह में यहां एक माह का मेला लगता है। मार्कंडेय महादेव मंदिर उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थलों में से एक है। विभिन्न प्रकार की परेशानियों से ग्रसित लोग अपने दुःखों को दूर करने के लिए यहां आते हैं।

मार्कंडेय महादेव की पौराणिक कथा
मान्यता है कि एक बार नि:संतान मृकण्ड ऋषि तथा उनकी पत्नि मरन्धती को किसी ने व्यंग्य करके अपमानित किया कि बगैर पुत्र के उनका वंश नहीं बढ़ पाएगा तो उन्होंने संतान की कामना से पहले ब्रह्मा जी की तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने बताया कि उनके भाग्य को सिर्फ भगवान शिव बदल सकते हैं, फिर उन्होंने महादेव की कठिन तपस्या की और उनसे पुत्र प्राप्ति का वरदान पाया, लेकिन भगवान शिव ने साथ में यह भी कहा कि उनका पुत्र सिर्फ 12 साल तक ही जीवित रहेगा. इसके बाद उनके यहां मार्कंडेय नाम से संतान हुई। कुछ साल बीतने के बाद जब मार्कंडेय को अपनी अल्पायु के बारे में पता चला तो उसने उन्हीं महादेव के लिए तप करना शुरु किया जिनके आशीर्वाद से उनका जन्म हुआ था. फिर भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दीर्घायु प्रदान की और यमराज को 12 साल की उम्र पूरी होने पर बगैर उनके प्राण लिए ही लौट जाना पड़ा।

पूजा से पूरी होती है संतान सुख की कामना
मां गंगा और गोमती के तट पर स्थित मार्कंडेय महादेव मंदिर के बारे में मान्यता है कि कभी इसी स्थान पर राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति के लिए श्रृंगी ऋषि ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था. मान्यता है कि महादेव के इस पावन धाम पर विधि-विधान से पूजा करने पर व्यक्ति की संतान से जुड़ी कामना शीघ्र ही पूरी होती है. यही कारण है कि यहां पर देश के कोने-कोने से लोग अपनी इस कामना को लिए मार्कंडेय महादेव के मंदिर में पहुंचते हैं। अपने भक्तों की पूजा से शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले महादेव के इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यदि कोई भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ श्रावण मास में शिवलिंग पर एक लोटा गंगाजल और राम नाम लिखा बेलपत्र चढ़ा दे तो उसकी बड़ी से बड़ी मनोकामना शीघ्र ही पूरी होती है। मान्यता है कि मार्कंडेय महादेव की पूजा से व्यक्ति की अकाल मृत्यु का खतरा टल जाता है और शिव की कृपा से उसे लंबी उम्र का वरदान मिलता है।

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भागवत कथा सुनने से दैहिक, दैविक, भौतिक सभी तापों से मिलती है मुक्ति https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/149574/ Tue, 05 Aug 2025 06:20:16 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=149574 श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन भक्ति व भाव का अनुपम संगम
आचार्य शांतनु जी महाराज के ओजस्वी प्रवचनों से गूंजा सभागार

लखनऊ : राजधानी स्थित दयाल गेटवे कन्वेंशन सेंटर, विभूति खंड, गोमती नगर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन का आयोजन अत्यंत हर्षोल्लास और भक्ति की भावनाओं के साथ संपन्न हुआ। यह कथा प्रख्यात कथावाचक आचार्य शांतनु जी महाराज के पुण्य सान्निध्य में 3 अगस्त से आरंभ हुई है और 9 अगस्त 2025 तक प्रतिदिन सायं 5:00 बजे से 8:00 बजे तक आयोजित की जा रही है। सोमववार को संपूर्ण सभागार श्रद्धालुजनों की उपस्थिति से खचाखच भरा था। भक्ति में डूबे श्रोतागण संगीतमय भजनों, मंगलाचरण तथा आचार्यश्री के जीवनदायी प्रवचनों से बारंबार भावविभोर होते रहे।

थकावट हरने वाली दिव्य औषधि के समान होती है भागवत कथा
मंच पर व्यासपीठ से कथा का अमृतवर्षा करते हुए आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा, जब बुद्धिजीवी लोग संसार के मोह-माया, तनाव और व्यावसायिक जीवन की थकावट से संत्रस्त हो जाते हैं, तब वे आत्मिक विश्रांति के लिए कथा की ओर लौटते हैं। यह कथा उनकी थकावट को हरने वाली दिव्य औषधि के समान होती है। उन्होंने आगे कहा कि यह श्रीमद् भागवत कथा न केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ है, बल्कि यह वेद रूपी कल्पवृक्ष का परम फल है, जिसे सुनने से दैहिक, दैविक और भौतिक सभी प्रकार के तापों से मुक्ति प्राप्त होती है।आज के दिन कथा का क्रम भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल से संबंधित लीलाओं पर केंद्रित रहा। आचार्यश्री के लोकोन्मुख दृष्टिकोण और सरल भाषा में वर्णित गूढ़ तत्वज्ञान ने श्रोताओं के मन में आध्यात्मिक चेतना जागृत की।

लखनऊ वालों के लिए दुर्लभ अवसर, आध्यात्म यात्रा को बनाएं सशक्त
भक्तिरस में डूबी संगीतमय प्रस्तुति में अनेक भजनों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। कथा सुनने आए वरिष्ठ नागरिकों, युवाओं, महिलाओं और बच्चों सभी वर्गों ने मंत्रमुग्ध होकर कथामृत का रसपान किया। कथा का उद्देश्य केवल आध्यात्मिक अनुभूति तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में समरसता, सद्भाव और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना भी इसका एक महान लक्ष्य है। आचार्य शांतनु जी महाराज का अद्भुत वक्तृत्व और प्रगाढ़ ज्ञान समाज को दिशा देने वाला है। लखनऊ वासियों के लिए यह आयोजन एक दुर्लभ अवसर है जहाँ वे अपनी अध्यात्म यात्रा को सशक्त बना सकते हैं। अगले दिनों में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, गोवर्धन लीला, रासलीला जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों का सजीव वर्णन किया जाएगा।

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हर हिंदू की सुरक्षा भारत की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए : आचार्य शांतनु महाराज https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/149511/ Mon, 04 Aug 2025 06:21:04 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=149511 बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल की मौजूदा स्थितियों पर खुलकर बोले आचार्य, कहा- वैश्विक मंच पर भारत सरकार को हिंदुओं की रक्षा को निर्णायक कदम उठाने की आवश्यकता

लखनऊ : विगत कुछ महीनों में सहिष्णु, उदारमना और आस्थावान हिन्दू समाज पर हमले बढ़े हैं। बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में हिंदू समाज अपने ऊपर होने वाला अत्याचार झेलने को अभिशप्त है। वैश्विक मंच पर भारत सरकार को हिंदुओं की रक्षा के लिए निर्णायक कदम उठाने की आवश्यकता है। उक्त बातें विख्यात श्रीराम कथावाचक आचार्य शांतनु महाराज ने कहीं। वह रविवार को गोमतीनगर स्थित दयाल गेटवे कन्वेंशन सेंटर में वरिष्ठ पत्रकारों के साथ अनौपचारिक वार्ता में कर रहे थे।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि ‘हर हिंदू की सुरक्षा, चाहे वह कहीं भी निवास करता हो, भारत की नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।’ पत्रकारों के साथ संवाद में आचार्य शांतनु महाराज ने उत्तर प्रदेश की वर्तमान स्थिति, भारतीय संस्कृति और वैश्विक हिंदू समाज से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार साझा किए। आचार्य शांतनु ने पश्चिम बंगाल में ममता सरकार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए कहा कि लगातार हो रही अराजकता, अपराध और हिंसा से वहां आमजन भयभीत है। इस पर उन्होंने राष्ट्रपति शासन लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि राज्य में संविधान का शासन और नागरिक अधिकारों की पुनः स्थापना हो सके। उन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की कार्रवाई को पर्याप्त और जरूरी बताया।

बारिश के बावजूद श्रद्धालुओं की प्रवाह
दयाल गेटवे कन्वेंशन सेंटर में रविवार शाम को ‘श्रीमद् भागवत कथा’ का शुभारंभ प्रसिद्ध कथावाचक आचार्य शांतनु महाराज के श्रीमुख से शुरू हुआ। कथा 9 अगस्त तक प्रतिदिन सायं 5 से 8 बजे तक खुले मंच पर होगी। प्रथम संध्या में ही बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। पूज्य आचार्य शांतनु महाराज के श्रीमुख से बाह रही श्रीमद्भागवत कथा की सरिता आध्यात्मिक जागरण के साथ सामाजिक चेतना और राष्ट्र निर्माण के संदेश का सशक्त मंच बन गई है। व्यास पीठ से दिए अनुपम विचार लोकहित और राष्ट्रीय एकता की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे।

व्यासपीठ की अपनी मर्यादा रेखा, इसे लांघना नहीं चाहिए
आचार्य शांतनु महाराज ने कहा व्यासपीठ की अपनी मर्यादा रेखा होती है, इसे लांघना नहीं चाहिए। व्यासपीठ पर बैठे आचार्य को आत्मानुशासन, सौहार्दपूर्ण संवाद और सामाजिक सजगता का स्मरण रखना चाहिए। पत्रकारों के सवालों का उत्तर देते हुए महाराज श्री ने चेताया कि सभी संत-महापुरुषों को विवादास्पद बयानबाजी से बचना चाहिए। धर्म-समाज को एकजुट रखने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने विशेषकर अनिरुद्धाचार्य महाराज को भी यही सलाह दी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि समाज हमारे आचरण से प्रेरणा लेता है, इसलिए हमारी दोहरी जिम्मेदारी बनती है।

उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक बदलाव की सराहना
आचार्य शांतनु महाराज ने योगी आदित्यनाथ सरकार के आठ वर्षों की जोरदार सराहना करते हुए इसे ‘महापरिवर्तन’ का काल बताया। उन्होंने कहा, ‘अल्पकाल में कानून-व्यवस्था के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल की हैं। प्रांत में प्रत्येक वर्ग एवं नागरिक आज खुद को सुरक्षित महसूस करता है। अपराध और भ्रष्टाचार पर नकेल कसी गई है, जिससे आमजन को आत्मविश्वास एवं सुरक्षा का नया भाव मिला है।’ उन्होंने मुफ्त राशन, महिला सुरक्षा, पुलिस भर्ती, मेडिकल कॉलेज, कानून-व्यवस्था और डिजिटल निगरानी जैसी सरकारी उपलब्धियों को जनता के प्रति समर्पित शासन का प्रमाण बताया।

ऐतिहासिक नाम बदलने और पुनर्लेखन की वकालत : आचार्य शांतनु महाराज ने लखनऊ, आजमगढ़, अलीगढ़, सुल्तानपुर, फिरोजाबाद, ग़ाज़ीपुर जैसे नगरों के ऐतिहासिक नाम पुनर्स्थापित करने तथा इतिहास के सही पुनर्लेखन की जोरदार मांग उठाई। उन्होंने रामायण और महाभारत में उल्लेखित नगरों के प्राचीन गौरव को समाज के समक्ष पुनः रखने की आवश्यकता उजागर की।

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आध्यात्मिक शुद्धिकरण और सुरक्षा के लिए पानी, नमक, नाम का संयोजन https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/149394/ Sat, 02 Aug 2025 05:57:16 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=149394 डॉ.भरत राज सिंह

पानी, नमक और नाम का संयोजन एक शक्तिशाली आध्यात्मिक प्रथा है जो हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है। इस प्रथा के माध्यम से, हम अपने आध्यात्मिक जीवन को शुद्ध और सुरक्षित बना सकते हैं। पानी और नमक का संयोजन अक्सर शुद्धिकरण के लिए उपयोग किया जाता है। जब हम पानी में नमक मिलाकर नाम जाप करते हैं, तो यह हमारे आध्यात्मिक जीवन को शुद्ध करने में मदद करता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देने में मदद करता है।

आध्यात्मिक सुरक्षा
पानी और नमक का संयोजन आध्यात्मिक सुरक्षा प्रदान कर सकता है। जब हम पानी में नमक मिलाकर नाम जाप करते हैं, तो यह हमारे आध्यात्मिक जीवन को सुरक्षित बनाने में मदद करता है। यह नकारात्मक प्रभावों से बचाने और सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देने में मदद करता है।

मानसिक शांति और स्थिरता
नाम जाप के साथ पानी और नमक का संयोजन मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान कर सकता है। यह तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है और हमारे मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है।

आध्यात्मिक विकास
नाम जाप के साथ पानी और नमक का संयोजन आध्यात्मिक विकास में मदद कर सकता है। यह आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक समझ को बढ़ावा देने में मदद करता है और हमारे आध्यात्मिक जीवन को गहरा बनाने में मदद करता है।

कैसे इसका प्रयोग करें
पानी, नमक और नाम का संयोजन करने के लिए, आप निम्नलिखित चरणों का पालन कर सकते हैं:

  1. एक पात्र में पानी भरें।
  2. पानी में नमक मिलाएं।
  3. नाम जाप करें और पानी में नमक को मिलाते हुए अपने आध्यात्मिक इरादों या अभीष्ट को व्यक्त करें।
  4. पानी को अपने घर के बाहर किसी पेड़ या नाली में गिरा दें क्योंकि इसमें नकारात्मक एनर्जी अवशोषित है l
  5. नियमित रूप से इस प्रथा को करने से आपको आध्यात्मिक शुद्धिकरण और सुरक्षा का अनुभव हो सकता है।

निष्कर्ष
पानी, नमक और नाम का संयोजन एक शक्तिशाली आध्यात्मिक प्रथा है जो हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है। यह आध्यात्मिक शुद्धिकरण, सुरक्षा, मानसिक शांति और स्थिरता, और आध्यात्मिक विकास में मदद कर सकती है। नियमित रूप से इस प्रथा को करने से आपको आध्यात्मिक लाभ का अनुभव हो सकता है।

आध्यात्मिक प्रथाओं के लिए सुझाव

  1. नियमित रूप से नाम जाप करें।
  2. पानी और नमक का संयोजन करके अपने आध्यात्मिक जीवन को शुद्ध और सुरक्षित बनाएं।
  3. मानसिक शांति और स्थिरता के लिए ध्यान और प्राणायाम का अभ्यास करें।
  4. आध्यात्मिक विकास के लिए आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक समझ को बढ़ावा दें।
  5. अपने आध्यात्मिक जीवन को गहरा बनाने के लिए नियमित रूप से आध्यात्मिक प्रथाओं का अभ्यास करें।
    लेखक स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेस, लखनऊ में महानिदेशक हैं।)
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सावन मास में शिव आराधना का वैज्ञानिक महत्व https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/148951/ Thu, 24 Jul 2025 05:31:42 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=148951 प्रो.भरत राज सिंह, महानिदेशक (तकनीकी), एसएमएस, लखनऊ

भारतीय संस्कृति में श्रावण मास को अत्यंत पवित्र और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। यह मास मुख्यतः भगवान शिव की आराधना, व्रत, उपवास और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए समर्पित होता है। श्रद्धालु पूरे मास शिवलिंग पर जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, बेलपत्र अर्पण, रुद्राभिषेक एवं रात्रि जागरण करते हैं। परंतु क्या आपने कभी सोचा है कि इन धार्मिक क्रियाओं के पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी हो सकता है? क्या श्रावण मास में शिव की उपासना केवल आस्था का विषय है या इसके पीछे प्रकृति और मानव शरीर के लिए कुछ वैज्ञानिक लाभ भी छुपे हैं? इस लेख में हम विस्तार से यह जानने का प्रयास करेंगे कि श्रावण मास में शिव आराधना का क्या वैज्ञानिक महत्व है, यह हमारे शरीर, मन, पर्यावरण और समाज पर किस प्रकार सकारात्मक प्रभाव डालती है।

  1. श्रावण मास का प्राकृतिक परिवेश
    •मौसम परिवर्तन और मानसून
    श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून का चरम समय होता है। इस दौरान आर्द्रता बढ़ जाती है, तापमान में गिरावट आती है और वातावरण जीवाणु-विषाणुओं की वृद्धि के लिए अनुकूल हो जाता है। इसी कारण यह मास रोगों की दृष्टि से संवेदनशील होता है।
    •जलवायु और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली
    इस मौसम में मनुष्य की पाचन शक्ति और प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है। कई लोग ज्वर, खांसी, पेट संबंधी विकारों और त्वचा रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। अतः शरीर और मन को संतुलित रखने के लिए विशेष सावधानियां आवश्यक होती हैं।
  2. भगवान शिव और उनके प्रतीकों का वैज्ञानिक विश्लेषण

•शिवलिंग और ऊर्जा का संकेतन
शिवलिंग वास्तव में ऊर्जा का प्रतीक है। ‘लिंग’ का अर्थ है चिन्ह या प्रतीक। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, शिवलिंग को एक स्पंदनशील ऊर्जा केन्द्र माना जाता है, जहां पर सकारात्मक कंपन (positive vibrations) मौजूद होते हैं। इसका आकार अंडाकार होता है, जो ब्रह्मांड की संरचना और ऊर्जा के संकेंद्रण को दर्शाता है।

•जलाभिषेक और ताप नियंत्रण
•श्रावण में विशेष रूप से शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, लगातार जलाभिषेक करने से पत्थर का शिवलिंग शीतल बना रहता है और उससे निकलने वाली ऊर्जा संतुलित रहती है। शिवलिंग के ऊपर जल चढ़ाने से उसकी सतह पर उत्पन्न गर्मी का नियंत्रण होता है, जिससे वह स्थिर ऊर्जा उत्सर्जित करता है।

•बेलपत्र, दूध और शहद का प्रयोग
बेलपत्र:बेलपत्र में औषधीय गुण होते हैं, जो वायु विकार, मधुमेह और लीवर रोग में लाभकारी हैं। शिव को बेलपत्र अर्पित करने का वैज्ञानिक कारण यह भी है कि इन पत्तों में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने की उच्च क्षमता होती है।
दूध और शहद:दूध एक शांत करने वाला तत्व है और शहद जीवाणुनाशक गुणों से भरपूर होता है। इन दोनों से शिवलिंग पर अभिषेक करने से वातावरण में शुद्धता आती है।

  1. उपवास और स्वास्थ्य लाभ
    •उपवास का वैज्ञानिक पक्ष
    श्रावण में सोमवार व्रत रखने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो उपवास करने से शरीर की पाचन क्रिया को विश्राम मिलता है और विषैले तत्व (toxins) बाहर निकल जाते हैं। यह एक प्रकार का ‘डिटॉक्सिफिकेशन’ है।
    •मानसिक शांति और ध्यान
    उपवास के साथ ध्यान, मंत्र जाप और ध्यानात्मक क्रियाएं मानसिक तनाव को कम करती हैं। इससे मस्तिष्क में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे रसायनों का स्त्राव होता है, जिससे व्यक्ति को सुख और संतोष की अनुभूति होती है।
  2. मंत्र, ध्वनि और कंपनों का प्रभाव
    •”ॐ नमः शिवाय” मंत्र की शक्ति
    “ॐ नमः शिवाय” पंचाक्षरी मंत्र है, जो मानव शरीर की पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) को संतुलित करता है। मंत्रोच्चारण से उत्पन्न कंपन हमारे मस्तिष्क और हृदय की धड़कनों को नियंत्रित करते हैं।
    •रुद्राभिषेक और ध्वनि चिकित्सा
    रुद्राभिषेक में उच्च स्वर में वेद मंत्रों का पाठ किया जाता है, जिससे सकारात्मक ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं। यह ‘साउंड थेरेपी’ का ही एक रूप है, जिससे मानसिक और भावनात्मक संतुलन बना रहता है।
  3. समाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव
    •सामूहिक पूजा और सामाजिक बंधन
    श्रावण मास में कांवड़ यात्रा, रात्रि जागरण और मंदिरों में सामूहिक पूजा से सामाजिक समरसता और एकता की भावना बढ़ती है। यह मानसिक संतुलन को भी बढ़ावा देता है।
    •पर्यावरणीय संतुलन
    श्रावण में वृक्षारोपण, जल संरक्षण, गौसेवा, और उपवास जैसे कार्य प्रकृति के संरक्षण में सहायक होते हैं। यह माह जन-सहभागिता से पर्यावरणीय चेतना फैलाने का उत्तम समय होता है।
  4. कांवड़ यात्रा का वैज्ञानिक विश्लेषण
    •यात्रा और सहनशक्ति
    कांवड़ यात्री कई किलोमीटर पैदल चलते हैं, जिससे उनकी शारीरिक सहनशक्ति, मानसिक दृढ़ता और अनुशासन में वृद्धि होती है। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक फिटनेस कार्यक्रम बन जाता है।
    •जल का महत्व
    गंगा जल को शिवलिंग पर चढ़ाने की परंपरा न केवल धार्मिक है, बल्कि गंगा जल की औषधीय और रोगनाशक गुणों को भी प्रमाणित करती है। इससे वातावरण की सूक्ष्म ऊर्जा शुद्ध होती है।
  5. योग, प्राणायाम और ध्यान का महत्व
    श्रावण में शिव उपासना के साथ योग, प्राणायाम और ध्यान करना विशेष फलदायी माना गया है। वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि इन प्रक्रियाओं से –
    •रक्तचाप नियंत्रित होता है,
    •हृदय स्वस्थ रहता है,
    •तनाव और चिंता में कमी आती है।
    इनका नियमित अभ्यास व्यक्ति को आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से संतुलित बनाता है।
  6. श्रावण और चंद्रमा का संबंध
    श्रावण मास पूर्णतः चंद्रमा की गति पर आधारित होता है। इस दौरान चंद्रमा का आकर्षण पृथ्वी पर जल तत्व को प्रभावित करता है, जिससे ज्वार-भाटे, मानसिक असंतुलन और भावनात्मक उतार-चढ़ाव होते हैं। शिव की आराधना विशेष रूप से मन के नियंत्रण में सहायक होती है क्योंकि शिव स्वयं ‘चंद्रशेखर’ हैं—जो चंद्रमा को अपने शीश पर धारण करते हैं। इसका तात्पर्य यह भी है कि वह मन पर नियंत्रण रखने वाले देवता हैं।
  7. विज्ञान और श्रद्धा का संगम
    भारतीय परंपरा में धर्म और विज्ञान को एक-दूसरे के पूरक माना गया है। श्रावण मास में शिव की पूजा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक पद्धति है जो –
    •शरीर को डिटॉक्स करती है,
    •मन को संतुलित करती है,
    •सामाजिक समरसता बढ़ाती है,
    •और पर्यावरण को संरक्षित करती है।
    इस प्रकार, यह मास जीवन के सभी पक्षों—शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आत्मिक—का संतुलन बनाए रखने में सहायक है।

श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना का वैज्ञानिक महत्व अत्यंत गूढ़ और लाभप्रद है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि एक जीवन शैली है जो योग, आहार, आचरण, अनुशासन और सामूहिकता को समाहित करती है। आज जब पूरा विश्व मानसिक तनाव, शारीरिक बीमारियों और पर्यावरणीय असंतुलन से जूझ रहा है, ऐसे समय में भारतीय ऋषियों द्वारा प्रतिपादित यह परंपरा अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है।हमें चाहिए कि हम इस धार्मिक अनुष्ठान को केवल आस्था के रूप में न देखकर इसके वैज्ञानिक और व्यवहारिक पक्षों को भी समझें तथा अपनी नई पीढ़ी को इस दिशा में जागरूक करें।

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कांवड़ : श्रद्धा, साधना और शिव से साक्षात्कार की यात्रा https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/148314/ Sat, 12 Jul 2025 07:44:39 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=148314 कहते है कांवड़ यात्रा का प्रत्येक कदम एक अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य देता है। और सच भी यही है। यह भारत की आत्मा से निकला हुआ वह विश्वास है, जो हर साल सावन में अपने कंधों पर धर्म, संस्कृति और श्रद्धा को उठाए चलता है। आज जब हम ‘कांवड़ यात्रा’ को केवल एक धार्मिक उत्सव मानते हैं, तो हम उसके भीतर की चेतना को कम कर देते हैं। यह यात्रा एक लोक-तीर्थ है, यह तीर्थ वह है जो स्वयं बनता है, जिसमें श्रद्धालु ही पुरोहित हैं और श्रद्धा ही विधान है। कांवड़ शिव का निमंत्रण नहीं, शिव से मिलने का संकल्प है। यह यात्रा जल के सहारे आत्मा की अग्नि को शांत करने की आराधना है। यह यात्रा हर कदम पर ‘हर हर महादेव’ को स्वयं में धारण करने की प्रक्रिया है। श्रावण मास में शिवभक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। छोटे-बड़े, युवा-वृद्ध, नर-नारी, सब एक समान केसरिया परिधान में “बोल बम” के नारे लगाते हुए कांवड़ यात्रा पर निकल पड़ते हैं। यह धार्मिक अनुष्ठान केवल जलाभिषेक नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रण, त्याग और परंपरा का अनूठा संगम बन जाता है। सावन में शिवभक्तों की यह यात्रा हमें सिखाती है कि श्रद्धा में शक्ति है, संकल्प में सामर्थ्य है, और भक्ति में वह ऊर्जा है जो असंभव को भी संभव बना देती है। कांवड़ यात्रा हर वर्ष न केवल सड़कों को गुलजार करती है, बल्कि हृदयों को शिव-भाव से सराबोर कर देती है।

सुरेश गांधी

श्रावण मास का आगमन होते ही देश भर की सड़कों पर एक विशेष दृश्य दिखाई देता है. केसरिया वस्त्रों में लिपटे, कंधे पर गंगाजल से भरी कांवड़ उठाए भक्त, “हर-हर महादेव“ की गूंज के साथ शिव के धाम की ओर बढ़ते हुए। यह कोई सामान्य यात्रा नहीं, यह श्रद्धा, तपस्या और शिवत्व की खोज की वह चिरंतन परंपरा है, जो हर वर्ष सावन में पुनः जीवंत होती है। भारत की हजारों वर्षों पुरानी धार्मिक चेतना में शिव एक ऐसे देवता हैं, जो निर्विकारी हैं, निराकार हैं, फिर भी सबसे साकार रूप में पूजित हैं। उन्हीं शिव को जल अर्पित करने की साधना का नाम है कांवड़ यात्रा। यह यात्रा केवल गंगाजल के उठान की नहीं, आत्मा के उत्थान की प्रक्रिया है। कांवड़ का अर्थ है, शिव के लिए वह परिश्रम, जो अपने भीतर की भक्ति को समर्पण में बदल देता है। श्रद्धालु जब गंगोत्री, हरिद्वार, ऋषिकेश, सुल्तानगंज या काशी से जल भरते हैं और सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर किसी शिवालय में जाकर अभिषेक करते हैं, तो वह केवल धार्मिक कर्म नहीं करते, वे एक वैदिक संकल्प को साकार करते हैंकृ“शिवो भूत्वा शिवं यजेत।”

कांवड़ की परंपरा को लेकर पुराणों और लोककथाओं में अनेक सन्दर्भ मिलते हैं। समुद्र मंथन के समय निकले विष को जब शिव ने पिया, तो उनकी तप्त जठराग्नि को शांत करने के लिए जलाभिषेक किया गया। कहा जाता है कि रावण और भगवान परशुराम ने शिव की आराधना के लिए जल से कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। वहीं, श्रवण कुमार की कथा तो भारतीय मानस में आदर्श बन गई, जब उन्होंने कांवड़ में माता-पिता को बिठाकर तीर्थयात्रा करवाई। इस प्रकार कांवड़ यात्रा केवल जल का वहन नहीं, बल्कि धर्म, सेवा और तप का संगम है। गंगा, जो विष्णु के चरणों से निकली और शिव की जटाओं में समाई, वही जब कांवड़ में भरकर फिर से शिव को समर्पित की जाती है, तो यह एक चक्र की पूर्णता है। यह केवल जलाभिषेक नहीं, बल्कि शिव और गंगा की संयुक्त आराधना है। शिवमहिम्न स्तोत्र के अनुसार, जल चढ़ाकर हम शिव से वही शक्ति वापस मांगते हैं, जो उन्होंने सृष्टि की रचना और कल्याण के लिए समर्पित की।

कांवड़ यात्रा की सबसे अद्भुत बात यह है कि यह बिना निमंत्रण, बिना संगठन, बिना शासन के आदेश के होती है। लोग स्वतः प्रेरित होते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान से लेकर बंगाल तक लाखों कांवरिया हरिद्वार, देवघर, पुरा महादेव या काशी से जल लेकर निकलते हैं। गांव-गांव में शिवालय सजते हैं, घर-घर में शिव आराधना होती है। यहां तक कि पर्यावरण और समाज भी इसका हिस्सा बन जाते हैं। रास्ते में जगह-जगह “कांवड़ शिविर“, जलपान केंद्र, प्राथमिक चिकित्सा स्टॉल, सांस्कृतिक मंच आदि इसकी जीवंतता को उत्सव में बदल देते हैं। इसे किसी एक समुदाय, जाति, वर्ग या भाषा से नहीं जोड़ा जा सकताकृयह भारत की साझा संस्कृति और समवेत श्रद्धा का प्रतीक है। कांवड़ यात्रा न केवल धार्मिक कर्म है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद भी है। जल की यह यात्राकृजहां स्वयं कांवरिया जल से भीगता हैकृहमें पर्यावरण, जल-संरक्षण, श्रम और संयम का संदेश देती है। यह एक चलायमान योग साधना है, जिसमें शरीर तपता है, मन शिव में रमता है और आत्मा विमल होती है। जब लाखों कांवरिये गंगा से जल भरकर अपने गांव-नगर के शिवालयों तक पहुंचते हैं, तो साथ में वे गंगा की पुण्यता, सांस्कृतिक गौरव और धार्मिक चेतना को भी पहुंचाते हैं। यह एक विराट आंदोलन हैकृजो धर्म, परंपरा और राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत संगम है।

श्रावण का जलाभिषेक
श्रावण मास जब आता है, तो गगन में घटाएँ उमड़ती हैं, धरती पर हरीतिमा लहराती है और भक्तों के मन में भक्ति की बाढ़ आ जाती है। यह महीना शिवभक्ति का, तप और संयम का, और समर्पण का प्रतीक है। उत्तर से दक्षिण और पर्वत से सागर तक “हर हर महादेव” और “बोल बम” के नारों से सारा देश शिवमय हो उठता है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा का उत्सव है। श्रावण मास का प्रत्येक सोमवार एक आध्यात्मिक अनुष्ठान बन जाता है। शिवलिंग पर जल, पंचामृत और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा केवल कर्मकांड नहीं, वह कृतज्ञता का प्राकट्य हैकृउन महादेव के प्रति जिन्होंने हलाहल पान कर सृष्टि की रक्षा की।

श्रद्धा का महासागर
श्रावण में शिवभक्ति की सबसे अद्वितीय अभिव्यक्ति है कांवड़ यात्रा। यह यात्रा केवल गंगाजल का परिवहन नहीं, आत्मा की यात्रा है, जहां प्रत्येक कांवड़िया “मैं” से “हम” की ओर बढ़ता है। पैरों में छाले, आंखों में दृढ़ संकल्प और कंधे पर गंगाजल लिए ये यात्री देश की धार्मिक चेतना का चलायमान रूप हैं। प्राचीन समय में जब राजस्थान के मारवाड़ी समाज के लोग गोमुख से जल लेकर रामेश्वरम तक पदयात्रा करते थे, तो वह केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि उत्तर से दक्षिण तक की सांस्कृतिक कड़ी का प्रवाह था। आज यह परंपरा भले ही डाक कांवड़, खड़ी कांवड़ या दांडी कांवड़ जैसे विभिन्न रूपों में परिवर्तित हो गई हो, लेकिन उसकी आत्मा अब भी वैसी ही हैकृअडिग, अपराजेय और आस्थामयी।

सामाजिक समरसता और सेवा का पर्व
श्रावण मास केवल भक्ति का पर्व नहीं, सेवा का संगम भी है। देश के हर कोने में कांवड़ियों के स्वागत में शिविर, भंडारे, चिकित्सा सेवा, जल वितरण की व्यवस्था होती है। आमजन, पुलिस, प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाएं एक समान भाव से इस महायात्रा को अपना योगदान देती हैं। यही भारत की सनातन शक्ति हैकृजहाँ धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, वह लोकसेवा से जुड़ा है।

नव पीढ़ी के लिए प्रेरणा
जब बच्चे, युवा, वृद्ध और महिलाएं भी इस यात्रा में सम्मिलित होते हैं, तो यह केवल धार्मिक भावना का उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और जीवनमूल्यों की पाठशाला बन जाती है। जिस प्रकार “बम बम भोले“ का स्वर संपूर्ण शरीर में ऊर्जा भर देता है, उसी प्रकार यह यात्रा हर मनुष्य में संयम, अनुशासन और आत्मनियंत्रण की भावना भरती है।

उत्सव नहीं, उत्सर्ग है श्रावण
श्रावण मास केवल पूजा-पाठ का अवसर नहीं, यह तप का प्रतीक है। यह आत्मा को स्वच्छ करने का, विचारों को परिष्कृत करने का, और भगवान शिव के समक्ष अपनी सीमाओं को लांघने का अवसर है। यह मास हमें सिखाता है कि विष पीने वाले शिव की पूजा केवल जल से नहीं, अपने जीवन में भी उनके जैसे त्याग, सहनशीलता और करुणा लाकर की जानी चाहिए। वर्तमान समय में जब भौतिकता हावी है, तब श्रावण और कांवड़ यात्रा जैसे आयोजन हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं, हमारे अंदर सोई मानवीय संवेदनाओं को जगाते हैं और हमें सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में

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सावन में घर बैठे प्राप्त करें सोमनाथ और काशी विश्वनाथ का प्रसाद : केके यादव https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/148236/ Wed, 09 Jul 2025 21:17:54 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=148236 सोमनाथ हेतु ₹270 और काशी विश्वनाथ हेतु ₹251 रूपये का ई-मनीआर्डर भेजना होगा : पोस्टमास्टर जनरल

डी.एन. वर्मा

भगवन शिव को समर्पित सावन माह 11 जुलाई से आरंभ हो रहा है। हर श्रद्धालु की इच्छा होती है कि वह भगवान शिव के ज्योतिर्लिङ्ग स्वरूप का दर्शन और आशीर्वाद स्वरुप प्रसाद पा सके। अब ऐसे श्रद्धालुओं को निराश होने की आवश्यकता नहीं है। डाक विभाग की स्पीड पोस्ट सेवा के माध्यम से लोग देश के किसी भी कोने में घर बैठे प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ (गुजरात) और काशी विश्वनाथ (वाराणसी) का प्रसाद मँगा सकते हैं। सावन माह में डाक विभाग ने इसके लिए विशेष प्रबंध किये हैं। उक्त जानकारी पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने दी।

पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि सोमनाथ ट्रस्ट और डाक विभाग के मध्य हुए एक एग्रीमेंट के तहत कोई भी श्रद्धालु मैनेजर, सोमनाथ ट्रस्ट, प्रभास पाटन, जिला- जूनागढ़, गुजरात-362268 को ₹ 270 रूपये का ई-मनीऑर्डर भेजकर स्पीड पोस्ट द्वारा प्रसाद मँगा सकता है। इस ई-मनीऑर्डर पर ‘प्रसाद के लिए बुकिंग’ अंकित करना होगा। तदोपरांत सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा संबंधित श्रद्धालु को 400 ग्राम का प्रसाद का पैकेट स्पीड पोस्ट द्वारा भेजा जायेगा। इस प्रसाद में 200 ग्राम बेसन लड्डू, 100 ग्राम तिल की चिक्की और 100 ग्राम मावा की चिक्की शामिल है।

कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि आदि ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के साथ-साथ वाराणसी स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट और डाक विभाग के बीच हुये एक एग्रीमेण्ट के तहत देश के किसी भी कोने में रह रहे श्रद्धालु अपने नजदीकी डाकघर से मात्र ₹ 251 रूपये का ई-मनीआर्डर प्रवर अधीक्षक डाकघर, वाराणसी (पूर्वी) मंडल-221001 के नाम भेजकर स्पीड पोस्ट से श्री काशी विश्वनाथ का प्रसाद मँगा सकते हैं। ई-मनीऑर्डर प्राप्त होते ही डाक विभाग द्वारा तत्काल दिए गए पते पर स्पीड पोस्ट द्वारा प्रसाद भेज दिया जाएगा।

पोस्टमास्टर जनरल ने बताया कि प्रसाद में काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिङ्ग की छवि, महामृत्युंजय यंत्र, शिव चालीसा, 108 दाने की रुद्राक्ष की माला, बेलपत्र, माता अन्नपूर्णा से भिक्षाटन करते भोले बाबा की छवि अंकित सिक्का, भभूति, रक्षा सूत्र, रुद्राक्ष मनका, मेवा, मिश्री का पैकेट इत्यादि शामिल हैं। सूखा होने के कारण यह प्रसाद लम्बे समय तक उपयोग में बना रहता है। उन्होंने बताया कि, डाक विभाग ने इस बात के भी प्रबंध किए हैं कि, श्रद्धालुओं को मोबाइल नंबर पर स्पीड पोस्ट का विवरण एस.एम.एस के माध्यम से मिलेगा। इसके लिए उन्हें ई-मनीऑर्डर में अपना पूरा पता, पिन कोड और मोबाइल नंबर लिखना अनिवार्य होगा।

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कैलाश मानसरोवर जहां दर्शनमात्र से खुल जाते हैं स्वर्ग के द्वार https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/147852/ Wed, 02 Jul 2025 07:39:25 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=147852 लास्मान सुरोवर के निर्मल जल में झलकते हैं मोक्ष के द्वार, जहां हिमखंडों की गोद में विराजते हैं आदि देव, त्रिपुरारी, भगवान शिव। जिसके ऊपर स्वर्ग है और नीचे मृत्युलोक है. शिवपुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण समेत कई ग्रंथों में कैलाश का जिक्र मिलता है. कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है. यह वही कैलाश है : जहां कड़कड़ाती ठंड में भी जीवन की तपस्या चलती है, जहां हर बर्फ का कण ’ॐ नमः शिवाय’ का जप करता है। कैलाश : शिव का वो परंपावन धाम है, जहां समय भी ठहर जाता है, सांसें भी शिवमय हो जाती हैं। यहां का हर पत्थर, हर झरना, हर हवा शिव की महिमा गुनगुनाती है। जहां लास्मान सुरोवर के दर्शन मात्र से आत्मा पावन हो जाती है, और महादेव के चरणों में मन स्थिर हो जाता है। कैलाश, न केवल एक स्थान है, बल्कि यह स्वयं मुक्ति का मार्ग है। इतना ही नहीं कैलाश को धरती का ’अक्षय धाम’ कहा जाता है, जहां समय, जीवन और मृत्यु तीनों निरर्थक हो जाते हैं. मानसरोवर ब्रह्मा के मन से बना है और यहीं से सरयू, सतलुज, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियां निकलती हैं। यह सरोवर लगभग 15,100 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक मीठे पानी की झील है, जिसका मुख्य स्रोत कैलाश है।

सुरेश गांधी

हिमालय की गोद में बसा कैलाश पर्वत न केवल भूगोल की दृष्टि से एक अद्भुत स्थल है, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह सम्पूर्ण सृष्टि का केंद्र माना जाता है। यह वह जगह है जहां हिमालय की गोद में बसा है परमधाम और वास करते हैं स्वयं महादेव. बर्फ की चादर ओढ़े कैलाश पर्वत शिव के धाम का न सिर्फ प्रतीक है, बल्कि लास्मान सुरोवर में झलकता है महादेव के दिव्य दर्शन का सौभाग्य. यहां की ठंडी हवाओं में, बर्फ की चादरों में, और हर हिमखंड में शिव का ही आभास होता है। जी हां, कुबेर की नगरी, भगवान शिव का निवास, बौद्ध, जैन और सिख धर्म मानने वालों के लिए आस्था का केंद्र, वैज्ञानिकों के लिए रहस्य तो वेदों, पुराणों और लोककथाओं में अनगिनत कहानियां समेटे हुए है कैलाश मानसरोवर. कैलाश मानसरोवर भारत और तिब्बत की सीमा पर स्थित एक पवित्र स्थल है. इसे हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म में काफी अहम माना गया है. कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील का विशेष धार्मिक, ऐतिहासिक, और भौगोलिक महत्व है. हिन्दू धर्म में कैलाश पर्वत भगवान शिव का घर माना जाता है. मान्यता है कि शिवजी, पार्वती अपने दो पुत्र, गणेश और कार्तिकेय के साथ कैलाश पर्वत पर ही निवास करते हैं. हिन्दू मान्यता के अनुसार, कैलाश पर्वत के दर्शन और मानसरोवर झील में स्नान करने से सभी पाप समाप्त हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है.

पौराणिक कथानुसार कहा जाता है की ये जगह कुबेर की नगरी है. यहीं से भगवान विष्णु के चरण कमलों से निकलकर गंगा नदी कैलाश पर्वत की चोटी पर विकराल वेग के साथ गिरती है, जहां भगवान शिव उन्हें अपनी जटाओं में धारण कर लेते हैं और धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित कर देते हैं. बौद्ध धर्म में कैलाश पर्वत को एक पवित्र स्थल के रूप में पूजा जाता है. इसे “कांगरीनबो“ कहा जाता है और यहां बौद्ध धर्म के अनुयायी ध्यान और साधना के लिए आते हैं. बौद्ध परंपरा में इसे बोधिसत्त्व के स्थान के रूप में माना जाता है. कैलाश पर्वत को बौद्ध धर्म में एक विशेष स्थान प्राप्त है. इसे बौद्धों द्वारा “ओम मणि पद्मे हूं“ मंत्र का केंद्र भी माना जाता है, जो करुणा और ज्ञान का प्रतीक है. जैन धर्म में भी कैलाश पर्वत को विशेष स्थान प्राप्त है. यहां पर भगवान ऋषभदेव के तप करने की मान्यता है. सिख धर्म में कैलाश पर्वत का उल्लेख भी मिलता है. कहा जाता है कि गुरु नानक देव ने यहां की यात्रा की थी. मानसरोवर झील को हिन्दू धर्म में पवित्र माना जाता है. इसे ’स्वर्ग की झील’ भी कहा जाता है. कहते है जो भी व्यक्ति मानसरोवर झील की धरती को छू लेता है, वह ब्रह्मा के बनाए हुए स्वर्ग में पहुंच जाता है. मानसरोवर में पांडवों के जाने का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है. खास यह है कि शरीर त्यागने के बाद माता सीता मानसरोवर के रास्ते से ही स्वर्ग लोक गई थी. भगवान शिव की कृपा के कारण ही सरोवर का जलस्तर हमेशा एक समान रहता है. मान्यता है कि कैलाश पर्वत के रास्ते 33 कोटि देवी देवता आते हैं और सरोवर में स्नान करते हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह स्थान धरती का केंद्र है. धरती के एक ओर उत्तरी ध्रुव है, तो दूसरी ओर दक्षिणी ध्रुव. दोनों के बीचोबीच है कैलाश पर्वत. कहा जाता है कि आजतक कोई भी कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ सका है. दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर पर्वतारोहियों ने परचम लहराया है. लेकिन कैलाश पर कोई भी नहीं चढ़ सका है. कई लोगों ने दावा किया है कि जब भी इसपर चढ़ने की कोशिश की गई तब-तब तेजी से लोगों के शरीर में बदलाव होते हैं. कैलाश पर्वत की ऊँचाई लगभग 22,000 फीट (6,638 मीटर) है। यह पर्वत विश्व की चार प्रमुख नदियों सिंधु, ब्रह्मपुत्र, सतलज और करनाली का उद्गम स्थल भी है। कैलाश पर्वत की विशेषता यह है कि इस पर किसी ने अब तक चढ़ाई नहीं की। इसे मानव स्पर्श से परे, एक दिव्य, अलौकिक स्थान माना जाता है। कहते है भगवान शिव यहां अपने दिव्य ध्यान में लीन रहते हैं। कैलाश के निकट स्थित लास्मान सुरोवर (जिसे मानसरोवर झील भी कहा जाता है) को अत्यंत पवित्र और मोक्षदायिनी माना जाता है। मान्यता है कि इसके जल में स्नान करने मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और आत्मा पावन हो जाती है। इस झील की खासियत है कि यह अपनी निर्मलता, शांति और दिव्यता के लिए प्रसिद्ध है। मानसरोवर का जल इतना स्वच्छ होता है कि इसमें कैलाश पर्वत की छवि स्पष्ट दिखती है।

कठिन लेकिन दिव्य यात्रा
कैलाश मानसरोवर की यात्रा अत्यंत कठिन मानी जाती है। ऊँचाई, ऑक्सीजन की कमी, तीव्र ठंड और दुर्गम रास्ते यात्रियों की परीक्षा लेते हैं। लेकिन हर कष्ट भी भक्तों के लिए आनंद का विषय बन जाता है क्योंकि इस यात्रा का हर कदम आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है। भारत सरकार और चीन सरकार द्वारा संयुक्त रूप से संचालित इस यात्रा के दो प्रमुख मार्ग हैं. लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) और नाथुला दर्रा (सिक्किम)। हालाँकि, तिब्बत की सीमा में प्रवेश के लिए चीन की अनुमति अनिवार्य होती है।

कैलाश परिक्रमा : कैलाश पर्वत की परिक्रमा (कोरला) अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। यह लगभग 52 किमी की कठिन पदयात्रा है, जिसे भक्त तीन दिन में पूरा करते हैं। मान्यता है कि इस परिक्रमा को एक बार करने से हजारों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। तिब्बती श्रद्धालु इसे दंडवत करते हुए परिक्रमा करते हैं, जिसे ’प्रणिपात परिक्रमा’ कहा जाता है।

वैज्ञानिक और रहस्यमयी दृष्टि : कैलाश पर्वत आज भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बना हुआ है। इसकी संरचना एक पिरामिड की तरह है और यह दुनिया के अन्य पवित्र स्थलों जैसे जेरूसलम, पिरामिड ऑफ गिजा और स्टोनहेंज से एक रहस्यमयी रेखा में स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि कैलाश पर्वत के चारों ओर प्राकृतिक चुंबकीय शक्ति का एक ऐसा केंद्र है, जो समय और आयु की गणना को प्रभावित करता है।

यात्रा का महत्व
कैलाश मानसरोवर केवल एक यात्रा नहीं है, यह जीवन की सबसे पवित्र आध्यात्मिक साधना है। यहां के बर्फीले वातावरण में जो दिव्यता है, वह किसी भी भक्त की आत्मा को झकझोर देती है। यहां आकर लगता है जैसे महादेव की सांसे स्वयं इस हिमालय की ठंडी हवाओं में घुली हुई हैं। लास्मान सुरोवर में स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश का तेज समाहित है। कैलाश बुलाता नहीं है, वह तभी दर्शन देता है जब स्वयं महादेव का आशीर्वाद हो। यह यात्रा कठिन जरूर है, लेकिन हर कदम आपको शिव के और करीब ले जाता है। यहां आकर लगता है जैसे हर बर्फ का कण, हर श्वास, हर धड़कन ’ॐ नमः शिवाय’ का जाप कर रही हो। झील में कैलाश पर्वत का प्रतिबिंब देखना सबसे शुभ क्षण माना जाता है।

यात्रा का मार्ग और प्रमुख पड़ाव : भारत से जाने के दो रास्ते : 1. लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड). 2. नाथुला दर्रा (सिक्किम). जबकि इसके प्रमुख पड़ाव : धारचूला, लिपुलेख, ताकलाकोट, मानसरोवर, कैलाश, डेरापुक, डोलमा ला पास व झोंगदो है।

यात्रा की विशेषताएं : केवल चयनित यात्रियों को ही अनुमति मिलती है। हर साल सीमित संख्या में श्रद्धालु जा पाते हैं। भारत सरकार और चीन सरकार की अनुमति अनिवार्य। ऊँचाई और मौसम से जुड़ी कठिनाइयां, लेकिन अद्भुत अनुभूति।

भक्ति की अंतिम यात्रा : यह यात्रा केवल पैरों से नहीं, यह हृदय और श्रद्धा से तय होती है। यहां पहुंचना सौभाग्य है, क्योंकि कैलाश बुलाता नहीं है, कैलाश तभी दर्शन देता है जब स्वयं महादेव बुलाएं।

पौराणिक मान्यताएं
रावण को हम प्रायः लंका का सम्राट, शिवभक्त, महान विद्वान और रामायण के खलनायक के रूप में जानते हैं, लेकिन रावण का संबंध केवल लंका और युद्ध तक सीमित नहीं था। भारतीय पौराणिक कथाओं में रावण से जुड़ी कई ऐसी कथाएं हैं, जो कम ज्ञात हैं, जिनमें सरयू नदी का विशेष स्थान भी उल्लेखनीय है। रावणः शिवभक्ति और विद्वत्ता का प्रतीक था. रावण न केवल एक महान योद्धा था, बल्कि वह परम शिव भक्त, उच्च कोटि का तंत्र साधक और प्रकांड पंडित भी था। कहा जाता है कि उसने ’शिव तांडव स्तोत्र’ की रचना स्वयं भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की थी। उसकी तपस्या, भक्ति और विद्या में कोई संदेह नहीं, किंतु उसका अहंकार ही उसके पतन का कारण बना।

सरयू नदी का पौराणिक महत्व
सरयू नदी अयोध्या से होकर बहती है और इसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम से गहरे रूप में जोड़ा जाता है। रामायण में यह नदी केवल एक भौगोलिक धारा नहीं, बल्कि दिव्य मोक्ष का द्वार भी मानी जाती है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने जीवन के अंतिम समय में सरयू नदी में जल समाधि ली थी और अपने दिव्य लोक में प्रस्थान किया था। कुछ कथाओं में उल्लेख मिलता है कि बाल्यकाल में रावण अयोध्या की धरती पर भी आया था। ऐसी मान्यता है कि रावण के पिता ऋषि विश्वश्रवा और उसकी माता कैकसी ने रावण के बाल्यकाल में उसे अयोध्या की यात्रा करवाई थी, जहां सरयू नदी के तट पर उसे वैदिक संस्कार सिखाए गए। सरयू के किनारे रावण ने अपनी प्रथम यज्ञ दीक्षा प्राप्त की थी। कुछ लोककथाओं के अनुसार, रावण जब भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने तपस्या काल में अयोध्या आया, तब उसने सरयू नदी के तट पर विशेष रुद्राभिषेक किया था। कहते हैं कि सरयू का निर्मल जल शिव को अत्यंत प्रिय है और रावण ने इसी जल से भगवान शिव को स्नान कराया था। अयोध्या के समीप प्राचीन समय में रावण द्वारा स्थापित एक शिवलिंग की भी चर्चा मिलती है, हालांकि इसका ऐतिहासिक प्रमाण बहुत सीमित है। कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि रावण ने सरयू के जल का प्रयोग शिव आराधना के लिए विशेष रूप से किया था, क्योंकि सरयू का जल ’मोक्षदायिनी’ माना जाता है।

रावण के राम से युद्ध का आध्यात्मिक संकेत
रावण और राम का युद्ध केवल अच्छाई और बुराई का युद्ध नहीं था, बल्कि यह अहंकार और मर्यादा के बीच संघर्ष था। रावण जहां अद्भुत शक्ति का प्रतीक था, वहीं राम मर्यादा और धर्म का प्रतिरूप। इस युद्ध के बाद जब भगवान श्रीराम सरयू नदी में जल समाधि लेते हैं, तो मान्यता है कि यही सरयू रावण के समर्पण का भी साक्षी बनी थी। कुछ कथाओं के अनुसार, रावण की आत्मा ने मोक्ष की प्राप्ति के लिए श्रीराम से अंतिम समय में सरयू तट पर क्षमा याचना की थी, और प्रभु राम ने अपने करुणामय स्वभाव से उसे मुक्ति प्रदान कर दी थी। कहा जा सकता है रावण केवल एक खलनायक नहीं था, बल्कि वह भारतीय संस्कृति का एक जटिल और बहुपक्षीय पात्र था। उसकी विद्वता, भक्ति और साहस आज भी चर्चा का विषय हैं। सरयू नदी, जो श्रीराम की महत्ता की प्रतीक मानी जाती है, रावण के जीवन में भी एक अदृश्य आध्यात्मिक धारा के रूप में जुड़ी रही है। यह संबंध हमें यह सिखाता है कि भले ही पात्रों का संघर्ष कैसा भी हो, भारत की नदियां और धरोहरें सबका समान रूप से कल्याण करती हैं। कैलाश पर्वत के पास ही राक्षस ताल नामक झील भी स्थित है, जिसे नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। झील का पानी अत्यंत निर्मल और मीठा होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानसरोवर झील में अद्भुत चुंबकीय ऊर्जा पाई जाती है।

भक्तों की ज़ुबानी : कैलाश बुलाता है, तभी रास्ता बनता है
आंखों में श्रद्धा, होठों पर ‘ॐ नमः शिवाय’ जप करते जब श्रद्धालुओं से पूछा गया तो अपने अनुभव साझा करते हुए ललित वर्मा कहते है वहां हर सांस में महादेव बसे है. “मैंने सुना था कैलाश बुलाता है, लेकिन इस यात्रा में मैंने इसे महसूस किया। कड़ाके की ठंड, सांस लेने में तकलीफ, मगर महादेव का आशीर्वाद हर कदम पर महसूस होता था। जब मानसरोवर झील में स्नान किया तो लगा जैसे आत्मा भी शिवमय हो गई। शरीर थक जाता था, मगर मन दौड़ता रहता था शिव की ओर। इस यात्रा ने मुझे भीतर से बदल दिया। वाराणसी के राजेश यादव कहते है, हमारा जत्था मानसरोवर की ओर बढ़ रहा था। ऑक्सीजन कम थी, मौसम अचानक खराब हो जाता था। कुछ पल तो लगा शायद आगे नहीं जा सकेंगे। लेकिन फिर शिव नाम की शक्ति मिली। लास्मान सुरोवर के तट पर बैठकर जब शिव के पर्वत की छाया देखी तो आंखों से आंसू बह निकले। ऐसा शांति का अनुभव शायद किसी मंदिर में भी नहीं मिला। यह शिव के साक्षात् दर्शन हैं। प्रयागराज की अर्चना तिवारी कहती है, कैलाश की परिक्रमा दुनिया की सबसे कठिन यात्राओं में मानी जाती है।

पत्थरीले रास्ते, उंचाई, बर्फ और ऑक्सीजन की कमी, हर पल शरीर हार मानने को तैयार था, लेकिन मन कहता था : ‘शिव हैं साथ, चलते रहो।’ डोलमा ला पास पर पहुंचते समय सचमुच लगा कि शिव ने कंधे पर हाथ रखा। वो पल मेरी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी पूंजी बन गई है। गोरखपुर के बनवारी लाल कहते है, मैंने कई वर्षों तक कैलाश यात्रा के लिए आवेदन किया, लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से रुकावट आ जाती थी। 5 साल बाद शुरु हो रहे इस यात्रा के लिए नाम स्वीकृत हो गया है। मैंने महसूस किया, शिव ने बुलाया है। जबकि उनके साथी शंकर दुबे, जो आठ साल पहले यात्रा कर आएं है का कहना है कि यात्रा कठिन थी, लेकिन असीम आनंद मिला। मानसरोवर झील में कैलाश का प्रतिबिंब देखकर मन में एक अद्भुत ऊर्जा दौड़ गई। ऐसा लगा जैसे शिव से प्रत्यक्ष बात कर रही हूं। जब पहली बार दूर से कैलाश पर्वत दिखा तो आंखें भर आईं। वह कोई सामान्य पहाड़ नहीं है, वह सचमुच दिव्य है। वहां की हवा, वहां का मौन, सब शिवमय है। मैंने जीवन में बहुत यात्राएं की हैं, लेकिन ऐसा शांति, ऐसा अद्भुत अहसास कहीं नहीं मिला। मैं लौटकर आया हूं लेकिन मेरा मन अब भी वहीं कैलाश की गोद में है।

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Bihar : चुनाव से पहले वोटर्स की जन्मतिथि व जन्मस्थान की होगी जांच https://thelucknowtimes.com/NewsArticle/147660/ Thu, 26 Jun 2025 08:30:39 +0000 https://thelucknowtimes.com/?p=147660 नई दिल्ली : भारत के चुनाव आयोग ने मंगलवार (24 जून, 2025) को बिहार के मुख्य निर्वाचन कार्यालय को एक स्पेशल ‘इंटेंसिव रिविज़न’ कराने का आदेश दिया है — जिसके तहत सभी मतदाताओं की जन्मतिथि और जन्मस्थान की जांच-पड़ताल की जाएगी. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, आदेश में कहा गया है, ‘आयोग ने अब पूरे देश में स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न शुरू करने का निर्णय लिया है ताकि मतदाता सूचियों की निष्पक्षता और अखंडता बनाए रखने के अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन किया जा सके. हालांकि, चूंकि बिहार राज्य में इस साल के उत्तरार्ध में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है, इसलिए आयोग ने राज्य में विशेष व्यापक पुनरीक्षण पहले करने का फैसला किया है. इस प्रक्रिया के आधार पर मतदाता सूची को अपडेट किया जाएगा.

द टेलीग्राफ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि अब तक मतदाता के रूप में आवेदन करने के लिए नागरिकों को सिर्फ निवास और जन्मतिथि का प्रमाण देना होता था. लेकिन अब जन्मस्थान के सत्यापन की अनिवार्यता ने इस प्रक्रिया को एक प्रकार की नागरिकता परीक्षा बना दिया है. यह फैसला उस वक्त लिया गया है जब भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया है कि अवैध बांग्लादेशी प्रवासी खुद को मतदाता के रूप में दर्ज करवा चुके हैं. वहीं कांग्रेस ने भी महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मतदाता सूची से छेड़छाड़ के आरोप लगाए हैं.

क्या है चुनाव आयोग का विशेष अभियान

इस प्रक्रिया के तहत बूथ स्तर अधिकारी (बीएलओ) बुधवार से घर-घर जाकर जांच करेंगे. वे मतदाताओं को गणना फॉर्म (एन्यूमरेशन फॉर्म) देंगे, जिसे मौके पर ही भरकर बीएलओ को वापस करना होगा. चुनाव आयोग ने इस अभियान के लिए कुछ दिशानिर्देश तय किए हैं:

अगर कोई घर बंद पाया जाता है, तो बीएलओ फॉर्म को दरवाज़े के नीचे से डाल देगा और कम से कम तीन बार फॉर्म लेने के लिए वापस आएगा. मतदाता ऑनलाइन भी यह फॉर्म जमा कर सकते हैं, लेकिन इसके बाद बीएलओ द्वारा फिज़िकल वेरिफिकेशन किया जाएगा. बिहार में करीब 7.73 करोड़ मतदाता हैं. गणना फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि 26 जुलाई है. ड्राफ्ट मतदाता सूची 1 अगस्त को प्रकाशित की जाएगी. इसके बाद 1 सितंबर तक मतदाता दावे और आपत्तियां दर्ज करा सकेंगे. अंतिम मतदाता सूची 30 सितंबर को जारी होने की संभावना है.

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